Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1719

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
वृ꣣त्रखादो꣡ व꣢लꣳ रु꣣जः꣢ पु꣣रां꣢ द꣣र्मो꣢ अ꣣पा꣢म꣣जः꣢ । स्था꣢ता꣣ र꣡थ꣢स्य꣣ ह꣡र्यो꣢रभिस्व꣣र꣡ इन्द्रो꣢꣯ दृ꣣ढा꣡ चि꣢दारु꣣जः꣢ ॥१७१९॥

वृ꣣त्रखादः꣢ । वृ꣣त्र । खादः꣢ । व꣣लꣳरुजः꣢ । व꣣लम् । रुजः꣢ । पु꣣रा꣢म् । द꣣र्मः꣢ । अ꣣पा꣢म् । अ꣣जः꣢ । स्था꣡ता꣢꣯ । र꣡थ꣢꣯स्य । ह꣡र्योः꣢꣯ । अ꣣भिस्वरे꣢ । अ꣣भि । स्वरे꣢ । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । दृ꣣ढा꣢ । चि꣣त् । आरुजः꣢ । आ꣣ । रुजः꣢ ॥१७१९॥

Mantra without Swara
वृत्रखादो वलꣳ रुजः पुरां दर्मो अपामजः । स्थाता रथस्य हर्योरभिस्वर इन्द्रो दृढा चिदारुजः ॥

वृत्रखादः । वृत्र । खादः । वलꣳरुजः । वलम् । रुजः । पुराम् । दर्मः । अपाम् । अजः । स्थाता । रथस्य । हर्योः । अभिस्वरे । अभि । स्वरे । इन्द्रः । दृढा । चित् । आरुजः । आ । रुजः ॥१७१९॥

Samveda - Mantra Number : 1719
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
सूर्य की शक्ति का वर्णन करते हैं कि — (वृत्रखादः) मेघ का भक्षक हिंसक है, (बलंरुजः) चराचर के बल का भंग करने वाला है, (पुरां दर्मः) ग्रामनगरादि और देहों को पुराना करने वाला — विदीर्ण करने वाला है, (अपामजः) आकाश मण्डल में मेघस्थ जलों का प्रेरक है (हर्योः) सीधी-तिरछी दो प्रकार की किरणों रूपी घोड़ों के (रथस्य) रथ का (स्थाता) बैठने वाला है, (इन्द्रः) सो इन्द्र (अभिस्वरे) अपने सर्वतोव्यापी उपताप वा गरमी में (दृढा) दृढ पदार्थों को (चित्) भी (आरुजः) भग्न कर देता है॥
Footnote
ऋग्वेद ३। ४५। २ में भी॥