Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 17

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- शुनः शेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣢श्वं꣣ न꣢ त्वा꣣ वा꣡र꣢वन्तं व꣣न्द꣡ध्या꣢ अ꣣ग्निं꣡ नमो꣢꣯भिः । स꣣म्रा꣡ज꣢न्तमध्व꣣रा꣡णा꣢म् ॥१७॥

अ꣡श्व꣢꣯म् । न । त्वा꣣ । वा꣡र꣢꣯वन्तम् व꣣न्द꣡ध्यै꣢ । अ꣣ग्नि꣢म् न꣡मो꣢꣯भिः । स꣣म्रा꣡ज꣢न्तम् । स꣣म् । रा꣡ज꣢꣯न्तम् । अ꣣ध्वरा꣡णा꣢म् ॥१७॥

Mantra without Swara
अश्वं न त्वा वारवन्तं वन्दध्या अग्निं नमोभिः । सम्राजन्तमध्वराणाम् ॥

अश्वम् । न । त्वा । वारवन्तम् वन्दध्यै । अग्निम् नमोभिः । सम्राजन्तम् । सम् । राजन्तम् । अध्वराणाम् ॥१७॥

Samveda - Mantra Number : 17
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
पूर्व मन्त्र से अनुवृत्ति करके “हे अग्ने” प्रकाशस्वरूप परमात्मन्! (अध्वराणाम्) ज्ञानयज्ञों के मध्य में (सम्राजन्तम्) मले प्रकार प्रकाशमान (अग्निम्) पूजनीय उपासनीय (त्वा) आप को (नमोभिः) प्रणामों से (वन्दध्यै) वन्दना करने के लिये “आहुवे” ध्यान करता हूँ, यह अगले मन्त्र से सम्बन्ध जोड़ना चाहिये। (वारवन्तम्) बालों वाले (अश्वं, न) अश्व के समान। जिस प्रकार बाल वाला घोड़ा दंश मशकादि का निवारण करता है इसी प्रकार आप भी हमारे बाधक काम क्रोधादि दुर्गुणों को अपने बालतुल्य सर्वोपकारक सामर्थ्यों से दूर करते हैं॥
भौतिकपक्ष में—अग्ने ! (अध्वराणाम्) कर्मयज्ञों के मध्य में (सम्राजन्तम्) अच्छे प्रकार प्रदीप्त (त्वा) तुझ (अग्निम्) अग्नि को (नमोभिः) स्थालीपाकादिसहित (बन्दध्यै) स्तुति करने = गुण वर्णन करने के लिये “मोहुवे” प्रधान करता हूं (वारवन्तम्) बालों वाले (अश्वं न) घोड़े के समान। अर्थात् जिस प्रकार घोड़ा पुच्छादि के बालों से ईति मच्छर आदि को निवृत्त करता है इसी प्रकार अग्नि में होम करने से अग्नि भी अपने चारों ओर से वायु आदि में रहने वाले दोषों वा कीड़ों को निवृत्त करता है। इसलिये यज्ञों के सम्राट् अग्नि को स्थालीपाकादि साथ लेकर कुण्ड में आहित करना चाहिये और साथ में उस अग्नि के गुणों का कीर्तन करना चाहिये॥
Footnote
अष्टाध्यायी ३। १। ११४॥ ३।४। ९॥ निघं० २।७॥ ३।१७॥ निरुक्त १। २० के प्रमाण संस्कृतभाष्य से देखिये॥ ऋग्वेद १।२७।१ में भी ऐसा ही पाठ है॥