Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1697

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेध्यातिथिः काण्वः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
दा꣣ना꣢ मृ꣣गो꣡ न वा꣢꣯र꣣णः꣡ पु꣢रु꣣त्रा꣢ च꣣र꣡थं꣢ दधे । न꣡ कि꣢ष्ट्वा꣣ नि꣡ य꣢म꣣दा꣢ सु꣣ते꣡ ग꣢मो म꣣हा꣡ꣳश्च꣢र꣣स्यो꣡ज꣢सा ॥१६९७॥

दा꣣ना꣢ । मृ꣣गः꣢ । न । वा꣣रणः꣢ । पु꣣रुत्रा꣢ । च꣣र꣡थ꣢म् । द꣣धे । न꣢ । किः꣣ । त्वा । नि꣢ । य꣣मत् । आ꣢ । सु꣣ते꣢ । ग꣣मः । महा꣢न् । च꣣रसि । ओ꣡ज꣢꣯सा ॥१६९७॥

Mantra without Swara
दाना मृगो न वारणः पुरुत्रा चरथं दधे । न किष्ट्वा नि यमदा सुते गमो महाꣳश्चरस्योजसा ॥

दाना । मृगः । न । वारणः । पुरुत्रा । चरथम् । दधे । न । किः । त्वा । नि । यमत् । आ । सुते । गमः । महान् । चरसि । ओजसा ॥१६९७॥

Samveda - Mantra Number : 1697
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(न) जैसे (मृगः) वनचर (वारणः) हाथी (पुरुत्रा) बहुत स्थलों पर (चरथम्) चरणशील (दाना) निज मद को (दधे) धारण करता फिरता है, वैसे ही (ओजसा) बल से (महान्) महान् इन्द्र भी (चरति) विचरता है (त्वा) उसको (न किः) कोई नहीं (नियमत्) निगृहीत करता, वह (सुते) सोम अभिषुत होने पर (आगमः) हमें प्राप्त होवे॥
जैसे जङ्गली हाथी मदमाता निरंकुश स्वेच्छाचारी मद चुवाता घूमता है; उसे कोई निगृहीत नहीं करता, इसी प्रकार बल से अति बली इन्द्र जो वायु विशेष वर्षा करता हुआ स्वतन्त्र घूमता है, हम चाहते हैं कि हमारे सोमयज्ञ में प्राप्त होकर वह सोमाहुति ग्रहण करे॥
Footnote
ऋ० ८। ३३। ८ में भी॥