Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 169

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
क꣡या꣢ नश्चि꣣त्र꣡ आ भु꣢꣯वदू꣣ती꣢ स꣣दा꣡वृ꣢धः꣣ स꣡खा꣢ । क꣢या꣣ श꣡चि꣢ष्ठया वृ꣣ता꣢ ॥१६९॥

क꣡या꣢꣯ । नः꣣ । चित्रः꣢ । आ । भु꣣वत् । ऊती꣢ । स꣣दा꣡वृ꣢धः । स꣣दा꣢ । वृ꣣धः । स꣣खा꣢꣯ । स । खा꣣ । क꣡या꣢꣯ । श꣡चि꣢꣯ष्ठया । वृ꣣ता꣢ ॥१६९॥

Mantra without Swara
कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृधः सखा । कया शचिष्ठया वृता ॥

कया । नः । चित्रः । आ । भुवत् । ऊती । सदावृधः । सदा । वृधः । सखा । स । खा । कया । शचिष्ठया । वृता ॥१६९॥

Samveda - Mantra Number : 169
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
प्रकरण से इन्द्र ! राजन् ! (कया) किस रीति से तू (नः) हमारा (सखा) मित्र (आभुवत्) होवे ? उत्तर — (उती) रक्षा से॥ (कया) किस (वृता) कर्म से वा वृत्ति से (चित्रः) विचित्र गुण कर्म स्वभाव होवे ? उत्तर— (शचिष्ठया) प्रज्ञायुक्त से॥ इस प्रकार (सदावृधः) सर्वदा वृद्धि युक्त होवे॥
Footnote
अष्टाध्यायी (३। १। ३९) निघण्टु ३। ९ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद ४। ३१ में भी॥