Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 168

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रियमेधः आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣भि꣡ प्र गोप꣢꣯तिं गि꣣रे꣡न्द्र꣢मर्च꣣ य꣡था꣢ वि꣣दे꣢ । सू꣣नु꣢ꣳ स꣣त्य꣢स्य꣣ स꣡त्प꣢तिम् ॥१६८॥

अ꣣भि꣢ । प्र । गो꣡प꣢꣯तिम् । गो꣢ । प꣣तिम् । गिरा꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । अ꣣र्च । य꣡था꣢꣯ । वि꣣दे꣢ । सू꣣नु꣢म् । स꣣त्य꣡स्य꣣ । स꣡त्प꣢꣯तिम् । सत् । प꣣तिम् ॥१६८॥

Mantra without Swara
अभि प्र गोपतिं गिरेन्द्रमर्च यथा विदे । सूनुꣳ सत्यस्य सत्पतिम् ॥

अभि । प्र । गोपतिम् । गो । पतिम् । गिरा । इन्द्रम् । अर्च । यथा । विदे । सूनुम् । सत्यस्य । सत्पतिम् । सत् । पतिम् ॥१६८॥

Samveda - Mantra Number : 168
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्य ! (सत्पतिम्) सज्जनों के रक्षक और (गोपतिम्) पृथिवी के स्वामी (सत्यस्य, सूनुम्) सत्य के पुत्र (इन्द्रम्) राजा को (यथाविदे) जैसा जानता हो वैसा (गिरा) वाणी से (अभि, प्र, अर्च) सब प्रकार सत्कृत कर॥
अर्थात् हे मनुष्यो ! राजा सज्जनों का तथा पृथिवीस्थ अन्य प्राणियों का रक्षक है और सत्य न्याय का पुत्र अर्थात् सन्तान के तुल्य सेवक है। तुम वाणी से उसकी प्रशंसा करो परन्तु जैसा जानते हो वैसी ही। किन्तु चाटु (खुशामद) नहीं।
Footnote
पं० ज्वालाप्रसाद जी ने गो शब्द निघण्ट १। १ में पृथिवी का नाम होते हुए और ‘सत्य का पुत्र’ होते हुए भी वसुदेव के पुत्र कृष्णगोपाल के अवतार का वर्णन करके अपने अर्थ की निर्मूलता दर्शायी है। परमात्मा को अजन्मा कहने वाली श्रुतियों से भी विरोध किया है। सायणाचार्य को भी यह अर्थ सम्मत नहीं है। न निरुक्त ने कहीं इन्द्र पद का अर्थ ‘कृष्ण’ किया और मन्त्र का देवता इन्द्र है॥
ऋ० ८।६९।४ में भी॥