Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1673

1875 Mantra
Devata- विष्णुः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त꣡द्विप्रा꣢꣯सो विप꣣न्य꣡वो꣢ जागृ꣣वा꣢ꣳसः꣢ स꣡मि꣢न्धते । वि꣢ष्णो꣣र्य꣡त्प꣢र꣣मं꣢ प꣣द꣢म् ॥१६७३॥

त꣢त् । वि꣡प्रा꣢꣯सः । वि । प्रा꣣सः । विपन्य꣡वः꣢ । जा꣣गृवा꣡ꣳसः꣢ । सम् । इ꣣न्धते । वि꣡ष्णोः꣢꣯ । यत् । प꣣रम꣢म् । प꣣द꣢म् ॥१६७३॥

Mantra without Swara
तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवाꣳसः समिन्धते । विष्णोर्यत्परमं पदम् ॥

तत् । विप्रासः । वि । प्रासः । विपन्यवः । जागृवाꣳसः । सम् । इन्धते । विष्णोः । यत् । परमम् । पदम् ॥१६७३॥

Samveda - Mantra Number : 1673
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(यत्) जो पूर्वोक्त (विष्णोः) विष्णु का (परमम्) सूक्ष्मतम (पदम्) स्वरूप है (तत्) उसको (विप्रासः) ऋतम्भरा प्रज्ञा वाले (विपन्यवः) विशेष करके स्तुतिपूर्वक भजन में तत्पर (जागृवांसः) स्तुति के शब्द और अर्थज्ञान में प्रमाद न करके जागने वाले योगी जन (समिन्धते) दूसरों के लिये प्रकाश करते = उपदेश द्वारा जताते हैं॥
इसमें भी अयोगिगम्य न होने, योगिगम्य होने और योगियों द्वारा अन्यों के प्रतिजताने योग्य विष्णुपद का वर्णन अवतारवाद का विरोध करता है। अवतारवादानुसार तो विष्णुपद आंख का विषय ही कहा जाता, जिसका मन्त्र से विरोध है॥
Footnote
ऋ० १। २२। २१ यजुः ३४। ४४ में भी॥