Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1672

1875 Mantra
Devata- विष्णुः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त꣡द्विष्णोः꣢꣯ पर꣣मं꣢ प꣣द꣡ꣳ सदा꣢꣯ पश्यन्ति सू꣣र꣡यः꣢ । दि꣣वी꣢व꣣ च꣢क्षु꣣रा꣡त꣢तम् ॥१६७२॥

त꣢त् । वि꣡ष्णोः꣢꣯ । प꣣रम꣢म् । प꣣द꣢म् । स꣡दा꣢꣯ । प꣣श्यन्ति । सूर꣡यः꣢ । दि꣣वि꣢ । इ꣣व । च꣡क्षुः꣢꣯ । आ꣡त꣢꣯तम् । आ । त꣣तम् ॥१६७२॥

Mantra without Swara
तद्विष्णोः परमं पदꣳ सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् ॥

तत् । विष्णोः । परमम् । पदम् । सदा । पश्यन्ति । सूरयः । दिवि । इव । चक्षुः । आततम् । आ । ततम् ॥१६७२॥

Samveda - Mantra Number : 1672
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सूरयः) विद्वान् ज्ञानी लोग (विष्णोः) विष्णु व्यापक अदृश्य परमात्मा के भी (तत्) उस (परमम्) अति सूक्ष्मतम (पदम्) स्वरूप को [जिस स्वरूप से उसने तीनों लोकों को व्याप रक्खा है] (सदा) सदा (पश्यन्ति) देखते हैं, अनुभव करते हैं (इव) जैसे (आततम्) पसारी हुई (चक्षुः) आँख (दिवि) आकाश में सब कुछ देखने योग्य दृश्य को देखती है तद्वत्॥
अर्थात् जैसे हमारी आंख दृश्य पदार्थों को साक्षात् देखती हैं वैसे ही ज्ञानियों के आत्मा अदृश्य परमात्मा के स्वरूप का भी साक्षात् अनुभव करते हैं। इसमें आँख का दृष्टान्त ही दार्ष्टान्त की भिन्नता प्रतिपादन करके परमेश्वर के स्वरूप की अतीन्द्रियता वा अदृश्यता का बोध कराता है। इस दशा में वामनावतार की शंकामात्र को भी अवकाश नहीं है॥
Footnote
ऋग्वेद १। २२। २० में तथा यजुः ६ — ५ में भी॥