Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1670

1875 Mantra
Devata- विष्णुः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्री꣡णि꣢ प꣣दा꣡ वि च꣢꣯क्रमे꣣ वि꣡ष्णु꣢र्गो꣣पा꣡ अदा꣢꣯भ्यः । अ꣢तो꣣ ध꣡र्मा꣢णि धा꣣र꣡य꣢न् ॥१६७०॥

त्री꣡णि꣢꣯ । प꣣दा꣢ । वि । च꣣क्रमे । वि꣡ष्णुः꣢꣯ । गो꣣पाः꣢ । गो꣣ । पाः꣢ । अ꣡दा꣢꣯भ्यः । अ । दा꣣भ्यः । अ꣡तः꣢꣯ । ध꣡र्मा꣢꣯णि । धा꣣र꣡य꣢न् ॥१६७०॥

Mantra without Swara
त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः । अतो धर्माणि धारयन् ॥

त्रीणि । पदा । वि । चक्रमे । विष्णुः । गोपाः । गो । पाः । अदाभ्यः । अ । दाभ्यः । अतः । धर्माणि । धारयन् ॥१६७०॥

Samveda - Mantra Number : 1670
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अदाभ्यः) जो किसी से मारा नहीं जा सकता, (गोपाः) जो सब लोक-लोकान्तरों का रक्षक है, उस (विष्णुः) व्यापक ईश्वर ने (त्रीणि) तीन (पदा) स्थानों=तीनों लोकों को (विचक्रमे) विक्रान्त किया हुआ है (अत) इस कारण (धर्माणि) अग्निहोत्रादि धर्म कर्मों को वेद द्वारा (धारयन्) पोषण करा रहा है॥
Footnote
ऋग्वेद १। २२। १८ में तथा यजुर्वेद ३४। ४३ में भी॥