Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 167

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- कुसीदी काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣡ तू न꣢꣯ इन्द्र क्षु꣣म꣡न्तं꣢ चि꣣त्रं꣢ ग्रा꣣भ꣡ꣳ सं गृ꣢꣯भाय । म꣣हाहस्ती꣡ दक्षि꣢꣯णेन ॥१६७॥

आ꣢ । तु । नः꣢ । इन्द्र । क्षुम꣡न्त꣢म् । चि꣣त्र꣢म् । ग्रा꣣भ꣢म् । सम् । गृ꣣भाय । महाहस्ती꣢ । म꣣हा । हस्ती꣢ । द꣡क्षि꣢꣯णेन ॥१६७॥

Mantra without Swara
आ तू न इन्द्र क्षुमन्तं चित्रं ग्राभꣳ सं गृभाय । महाहस्ती दक्षिणेन ॥

आ । तु । नः । इन्द्र । क्षुमन्तम् । चित्रम् । ग्राभम् । सम् । गृभाय । महाहस्ती । महा । हस्ती । दक्षिणेन ॥१६७॥

Samveda - Mantra Number : 167
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) हे राजन् ! तू (महाहस्ती) आजानुबाहु अर्थात् बड़े हाथों वाला (दक्षिणेन) अपने दाहिने वा चतुर हाथ से (नः) हमारे (क्षुमन्तम्) भोजनीय अन्न से युक्त (चित्रम्) विविध (ग्राभम्) न्यायोपार्जित धन का (आ, संगृमाय) सब ओर से संग्रह कर॥
लोक में भी क्षत्रिय की भुजा लम्बी घुटनों को स्पर्श करने वाली प्रसिद्ध हैं। उस बड़े हाथ वाले राजा को प्रजा के भोग के लिये धान्यादि सामग्री सहित विविध न्याय से कमाये घन का संग्रह करना चाहिये॥
Footnote
अष्टाध्यायी ६।३।१३३ निघण्टु २७ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ॠग्वेद ८।८१।१ में भी॥