Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1667

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
न꣢ घा꣣ व꣢सु꣣र्नि꣡ य꣢मते दा꣣नं꣡ वाज꣢꣯स्य꣣ गो꣡म꣢तः । य꣢त्सी꣣मु꣢प꣣श्र꣢व꣣द्गि꣡रः꣢ ॥१६६७॥

न꣢ । घ꣣ । व꣡सुः꣢ । नि । य꣣मते । दान꣢म् । वा꣡ज꣢꣯स्य । गो꣡म꣢꣯तः । यत् । सी꣣म् । उ꣡प꣢꣯ । श्र꣡व꣢꣯त् । गि꣡रः꣢꣯ ॥१६६७॥

Mantra without Swara
न घा वसुर्नि यमते दानं वाजस्य गोमतः । यत्सीमुपश्रवद्गिरः ॥

न । घ । वसुः । नि । यमते । दानम् । वाजस्य । गोमतः । यत् । सीम् । उप । श्रवत् । गिरः ॥१६६७॥

Samveda - Mantra Number : 1667
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(वसुः) ८ वसुओं में एक इन्द्र = सूर्य (गोमतः) इन्द्रियों को जगाने की शक्ति वाले (वाजस्य) बल के (दानम्) दान को (न घ) नहीं (नियमते) रोकता (यत् सीम्) जब कि (गिरः) वेदमन्त्रोक्त स्तुतियों को (उपश्रवत्) स्वीकार करे॥
जब कि सूर्य हमारी चाही बातों के अनुकूलवर्ती हो तो वह सब इन्द्रियों की शक्तिरूप बल प्रदान में कमी नहीं करता॥
Footnote
ऋ० ६। ४५। २३ में भी॥