Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 166

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
म꣣हा꣡ꣳ इन्द्रः꣢꣯ पु꣣र꣡श्च꣢ नो महि꣣त्व꣡म꣢स्तु व꣣ज्रि꣡णे꣢ । द्यौ꣡र्न प्र꣢꣯थि꣣ना꣡ शवः꣢꣯ ॥१६६॥

म꣣हा꣢न् । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । पु꣣रः꣢ । च꣣ । नः । महित्व꣢म् । अ꣣स्तु । वज्रि꣡णे꣢ । द्यौः । न । प्र꣣थिना꣢ । श꣡वः꣢꣯ ॥१६६॥

Mantra without Swara
महाꣳ इन्द्रः पुरश्च नो महित्वमस्तु वज्रिणे । द्यौर्न प्रथिना शवः ॥

महान् । इन्द्रः । पुरः । च । नः । महित्वम् । अस्तु । वज्रिणे । द्यौः । न । प्रथिना । शवः ॥१६६॥

Samveda - Mantra Number : 166
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्रः) परमैश्वर्ययुक्त राजा (महान्) प्रौढ़ (अस्तु) होवे (च) और (वज्रिणे) शस्त्रास्त्रधारी के लिये (नः) हमारे (पुरः) आगे (महित्वम्) बड़प्पन हो और (शवः) सेनाबल (प्रथिना) विस्तार से (द्यौर्न) द्युलोक के मान हो॥
राजा को उचित है कि महान् बलवान् शस्त्रास्त्र वाला और न्यायप्रकाश वाला हो॥
Footnote
सायणाचार्य ने “परश्व नु” ऐसा पदच्छेद करके व्याख्या की है जो पदग्रन्थ और समस्त मूल ग्रन्थों के विरुद्ध है। यथार्थ पाठ “पुरश्च नः” है। इस पर सत्यव्रत सामश्रमी जी कहते हैं कि “आश्चर्य है ! मूल में ‘नु’ पद कहाँ है ?” परन्तु हमारी सम्मति में आश्चर्य नहीं किन्तु ऋग्वेद (१। ८। ५) में “परश्च नु” यही पाठ है। इस लिये ऋग्वेदभाष्यकार सायणाचार्य ने वहीं की भ्रान्ति से सामवेद के पाठभेद को भूलकर वही ऋग्वेदतुल्य व्याख्या कर दी है। निघं० २। ९ का प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥