Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1658

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣡ह꣢ हरी꣢꣯ ब्रह्म꣣यु꣡जा꣢ श꣣ग्मा꣡ व꣢क्षतः꣣ स꣡खा꣢यम् । इ꣡न्द्रं꣢ गी꣣र्भि꣡र्गिर्व꣢꣯णसम् ॥१६५८॥

आ꣢ । इ꣣ह꣢ । हरी꣢꣯इ꣡ति꣢ । ब्र꣣ह्मयु꣡जा꣢ । ब्र꣣ह्म । यु꣡जा꣢꣯ । श꣣ग्मा꣢ । व꣣क्षतः । स꣡खा꣢꣯यम् । स । खा꣣यम् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । गी꣣र्भिः꣢ । गि꣡र्व꣢꣯णसम् । गिः । व꣣नसम् ॥१६५८॥

Mantra without Swara
एह हरी ब्रह्मयुजा शग्मा वक्षतः सखायम् । इन्द्रं गीर्भिर्गिर्वणसम् ॥

आ । इह । हरीइति । ब्रह्मयुजा । ब्रह्म । युजा । शग्मा । वक्षतः । सखायम् । स । खायम् । इन्द्रम् । गीर्भिः । गिर्वणसम् । गिः । वनसम् ॥१६५८॥

Samveda - Mantra Number : 1658
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(ब्रह्मयुजा) परमेश्वर के जोते हुए (शग्मा) सुखदायक (हरी) दो घोड़ों के समान दो प्रकार के सूर्य किरण (गिर्वणसम्) वेदमन्त्रप्रतिपादनानुकूलवर्ती (सखायम्) हितकारी (इन्द्रम्) देवराज इन्द्र को (गीर्भिः) वेद मन्त्रों से (इह) यहाँ यज्ञ में (आ वक्षत) बुलावें॥
सूर्य की सीधी तिरछी दो प्रकार की किरणें जो सूर्य के घोड़े हैं, सूर्य को हमारे किये यज्ञ तक पहुँचाती हैं जो कि वेदमन्त्रों में वैसा वर्णन किया है, अतः उन मन्त्रों को यज्ञ में उस समय पढ़ा जाता है और इन्द्र = सूर्य उन वेदवाणियों का सविभागपूर्वक सेवक = अनुकूलवर्ती है।
Footnote
ऋ० ८। २। २७ में भी॥