Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1655

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣡रू꣢प वृष꣣न्ना꣡ ग꣢ही꣣मौ꣢ भ꣣द्रौ꣡ धुर्या꣢꣯व꣣भि꣢ । ता꣢वि꣣मा꣡ उप꣢꣯ सर्पतः ॥१६५५

स꣡रू꣢꣯प । स । रू꣢प । वृषन् । आ꣢ । ग꣣हि । इ꣢मौ । भ꣣द्रौ꣢ । धु꣡र्यौ꣢꣯ । अ꣣भि꣢ । तौ । इ꣣मौ꣢ । उ꣡प꣢꣯ । स꣣र्पतः ॥१६५५॥

Mantra without Swara
सरूप वृषन्ना गहीमौ भद्रौ धुर्यावभि । ताविमा उप सर्पतः ॥१६५५

सरूप । स । रूप । वृषन् । आ । गहि । इमौ । भद्रौ । धुर्यौ । अभि । तौ । इमौ । उप । सर्पतः ॥१६५५॥

Samveda - Mantra Number : 1655
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सरूप) हे प्रत्येक वस्तु में समानरूप से वर्तमान ! (वृषन्) वर्षाकारक ! सूर्य ! (इमौ) इन (भद्रौ) सुखदायक (धुर्यौ) धुरे में जुड़ने योग्य घोड़ों के समान सीधी और तिरछी किरणों को (अभि) व्यापकर, (आगहि) प्राप्त हो (तौ) वे (इमौ) ये दोनों प्रकार की किरणें (उप सर्पतः) पास जाती हैं॥
सीधी तिरछी के भेद से दो प्रकार की किरणें सूर्य से संगत हैं, उन दोनों से सूर्य की धूप हमें प्राप्त होती रहे, यह भाव है॥२॥
Footnote
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