Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1652

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वत्सः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वि꣡ चि꣢द्वृ꣣त्र꣢स्य꣣ दो꣡ध꣢तः꣣ शि꣡रो꣢ बिभेद वृ꣣ष्णि꣡ना꣢ । व꣡ज्रे꣢ण श꣣त꣡प꣢र्वणा ॥१६५२॥

वि꣢ । चि꣣त् । वृत्र꣡स्य꣢ । दो꣡ध꣢꣯तः । शि꣡रः꣢꣯ । बि꣣भेद । वृष्णि꣡ना꣢ । व꣡ज्रे꣢꣯ण । श꣣त꣡प꣢र्वणा । श꣣त꣢ । प꣣र्वणा ॥१६५२॥

Mantra without Swara
वि चिद्वृत्रस्य दोधतः शिरो बिभेद वृष्णिना । वज्रेण शतपर्वणा ॥

वि । चित् । वृत्रस्य । दोधतः । शिरः । बिभेद । वृष्णिना । वज्रेण । शतपर्वणा । शत । पर्वणा ॥१६५२॥

Samveda - Mantra Number : 1652
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
प्रकरण से इन्द्र = विद्युत् रूप वृष्टिदेव (दोधतः) गर्जन से जगत् को कम्पाने वाले (वृत्रस्य) मेघमण्डल के (शिरः) उच्चभागरूप शिर को (वृष्णिना) वृष्टिकारक (शतपर्वणा) बहुत धार वाले (वज्रेण) प्रहार से (वि-चित्-बिभेद) अनेक प्रकार भी छिन्न-भिन्न करता है॥
Footnote
ऋग्वेद ८। ६। ६ में भी॥