Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 165

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣द꣡ꣳ ह्यन्वोज꣢꣯सा सु꣣त꣡ꣳ रा꣢धानां पते । पि꣢बा꣣ त्वा꣣३꣱स्य꣡ गि꣢र्वणः ॥१६५॥

इ꣣द꣢म् । हि । अ꣡नु꣢꣯ । ओ꣡ज꣢꣯सा । सु꣣त꣢म् । रा꣣धानाम् । पते । पि꣡ब꣢꣯ । तु । अ꣣स्य꣢ । गि꣢र्वणः । गिः । वनः । ॥१६५॥

Mantra without Swara
इदꣳ ह्यन्वोजसा सुतꣳ राधानां पते । पिबा त्वा३स्य गिर्वणः ॥

इदम् । हि । अनु । ओजसा । सुतम् । राधानाम् । पते । पिब । तु । अस्य । गिर्वणः । गिः । वनः । ॥१६५॥

Samveda - Mantra Number : 165
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(राधानाम्) घनों के (पते) स्वामिन् ! राजन् ! (गिर्वणः) वाणी से प्रशंसा योग्य ! (ओजसा) परिश्रम से (सुतम्) सिद्ध किये हुए (अस्य) इस सोम के (इदम्) इस भाग को (पिब) पीजिये। (अनु, हि, तु) पादपूरणार्थ हैं।
मनुष्यों को उचित है कि राजा के लिये सोमरस सिद्ध करके अर्पित करें और राजा उसका पान करे। और प्रजा को जीविका तथा रक्षा का दान करे, वह प्रशंसा के योग्य है॥
Footnote
ज्वालाप्रसाद भार्गव जी ने अनुक्रमणिका के विरुद्ध महानारायण देवता, (अ, अस्य) यह पदपाठ के विरुद्ध पदच्छेद, राघः पद निघण्टु २। १० में धन का वाचक होने से निघण्टु और सायण के विरुद्ध राधानाम् का अर्थ राधांश देवी, किया है॥ ऋ० ३। ५१। १० में भी॥