Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 164

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣢꣫ त्वेता꣣ नि꣡ षी꣢द꣣ते꣡न्द्र꣢म꣣भि꣡ प्र गा꣢꣯यत । स꣡खा꣢यः꣣ स्तो꣡म꣢वाहसः ॥१६४॥

आ꣢ । तु । आ । इ꣣त । नि꣢ । सी꣣दत । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । अ꣣भि꣢ । प्र । गा꣣यत । स꣡खा꣢꣯यः । स । खा꣣यः । स्तो꣡म꣢꣯वाहसः । स्तो꣡म꣢꣯ । वा꣣हसः ॥१६४॥

Mantra without Swara
आ त्वेता नि षीदतेन्द्रमभि प्र गायत । सखायः स्तोमवाहसः ॥

आ । तु । आ । इत । नि । सीदत । इन्द्रम् । अभि । प्र । गायत । सखायः । स । खायः । स्तोमवाहसः । स्तोम । वाहसः ॥१६४॥

Samveda - Mantra Number : 164
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सखायः) हे मित्रो ! (स्तोमवाहसः) स्तुति का प्रवाह चलाते हुए (आ तु आ इत) आओ आओ (निषीदत) बैठो और (इन्द्रम्) परमेश्वर का (प्रगायत) कीर्तन करो॥
Footnote
यद्यपि स्तोम का सामान्य अर्थ स्तुति मात्र है परन्तु ताण्ड्य महाब्राह्मण में स्तोमा के भेद वर्णन किये हैं। लोकों के प्रमोदार्थ हम थोड़े से यहाँ उद्धृत करते हैं।
ताण्ड्य महाब्राह्मण के द्वितीय और तृतीय अध्यायों में १ त्रिवृत् २ पञ्चदश ३ सप्तदश ४ एकविंश ५ त्रिणव ६ त्रयस्त्रिंश ये पृष्ठ्यषडह यज्ञ में छः स्तोत्र होते हैं। अनन्तर छन्दोमों के ३ स्तोम कहे हैं। उनमें से बहिष्यवमान के साधन त्रिवृत् नामक स्तोम की ३ विष्टुति हैं, उद्यती परिवर्तिनी और कुलायिनी। प्रथम ३ अनुवाकों से कही गई हैं। प्रथम उद्यती का स्वरूप यह है :—
तिसृभ्यो० २। २। १।
एक एक सोम की ५ विभक्ति होती हैं, हिंकार प्रस्ताव उद्गीथ प्रतिहार उपद्रवनिधन। उनमें से हिङ्कार ३ उद्गाताओं को करना चाहिये। अष्टाध्यायी २। ३। १४ का प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये। पहला उद्गाता पहली ऋचा को तीन बार, दूसरा दूसरी और तीसरा तीसरी को। इस प्रकार त्रिवृत् नामक स्तोम की पहली उद्यती नाम विष्टुति कहाती है। अव दूसरी परिवर्तिनी नाम विष्टुति का वर्णन करते हैं:—
तिसृभ्यो० २। २। १। इत्यादि
प्रथमा उद्यती में तो ३ ऋचाओं में एक-एक ऋचा को एक-एक उद्गाता तीन-तीन बार पढ़े, यह कहा। इस दूसरी परिवर्तनी नामक विष्टुति में १ उद्गाता १, २, ३, ऋचाओं को पढ़े, फिर दूसरा उद्गाता तीनों को पढ़े। फिर तीसरा भी। इस प्रकार दूसरी परिवर्तिनी नाम विष्टुति कहाती है। अव तीसरी कुलायिनी को सुनिये:—
तिसृभ्यो हि० २। ३। १॥
पहिला उद्गाता इस क्रम से पढ़े कि पहली दूसरी तीसरी। दूसरा उद्गाता दूसरी तीसरी पहली। तीसरा उद्गाता तीसरी पहिली दूसरी। इस प्रकार तीन पर्याय मिल कर तीसरी कुलायिनी नाम त्रिवृत् स्तोम की विष्टुति कहाती है। ३ विष्टुति से ही इसे त्रिवृत् स्तोम कहते हैं॥
इसी प्रकार पञ्चदशादि स्तोमों की पृथक्-पृथक् विष्टुतियां कही गई हैं जो वहीं ताण्ड्य महाब्राह्मण में देखनी चाहियें॥ ऋ० १।५।१ में भी॥