Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1633

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- रेभसूनू काश्यपौ Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
तं꣡ गाथ꣢꣯या पुरा꣣ण्या꣡ पु꣢ना꣣न꣢म꣣꣬भ्य꣢꣯नूषत । उ꣣तो꣡ कृ꣢पन्त धी꣣त꣡यो꣢ दे꣣वा꣢नां꣣ ना꣢म꣣ बि꣡भ्र꣢तीः ॥१६३३॥

तम् । गा꣡थ꣢꣯या । पु꣡राण्या꣢ । पु꣣नान꣢म् । अ꣣भि꣢ । अ꣣नूषत । उत꣢ । उ꣣ । कृपन्त । धीत꣡यः꣢ । दे꣣वा꣡ना꣢म् । ना꣡म꣢꣯ । बि꣡भ्र꣢꣯तीः ॥१६३३॥

Mantra without Swara
तं गाथया पुराण्या पुनानमभ्यनूषत । उतो कृपन्त धीतयो देवानां नाम बिभ्रतीः ॥

तम् । गाथया । पुराण्या । पुनानम् । अभि । अनूषत । उत । उ । कृपन्त । धीतयः । देवानाम् । नाम । बिभ्रतीः ॥१६३३॥

Samveda - Mantra Number : 1633
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(पुनानम्) शोघे गए हुये (तम्) उस सोमरस को (पुराण्या) पुराणी सनातनी (गाथया) गीतरूप वेदवाणी से (अभि—अनूषत) चारों ओर बैठें ऋत्विज स्तुत वा प्रशंसित करते हैं (उतो) और (देवानाम्) वायु, सूर्य, पूषा, अर्यमा आदि देवतों के (नाम) नामों को (बिभ्रतीः) धारती हुई (धीतयः) ऋत्विजों के हाथों की अंगुलियें (कृपन्त) समर्थ करती हैं॥
Footnote
ऋ० ९। ९९। ४ में भी॥