Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1625

1875 Mantra
Devata- विष्णुः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
कि꣡मित्ते꣢꣯ विष्णो परि꣣च꣢क्षि꣣ ना꣢म꣣ प्र꣡ यद्व꣢꣯व꣣क्षे꣡ शि꣢पिवि꣣ष्टो꣡ अ꣢स्मि । मा꣡ वर्पो꣢꣯ अ꣣स्म꣡दप꣢꣯ गूह ए꣣त꣢꣫द्यद꣣न्य꣡रू꣢पः समि꣣थे꣢ ब꣣भू꣡थ꣢ ॥१६२५॥

कि꣢म् । इत् । ते꣣ । विष्णो । परिच꣡क्षि꣢ । प꣣रि । च꣡क्षि꣢꣯ । ना꣡म꣢꣯ । प्र । यत् । व꣡वक्षे꣢꣯ । शि꣡पिविष्टः꣢ । शि꣢पि । विष्टः꣢ । अ꣣स्मि । मा꣡ । व꣡र्पः꣢꣯ । अ꣣स्म꣢त् । अ꣡प꣢꣯ । गू꣣हः । एत꣢त् । यत् । अ꣣न्य꣡रू꣢पः । अ꣣न्य꣢ । रू꣣पः । समिथे꣢ । स꣣म् । इथे꣢ । ब꣣भू꣡थ꣢ ॥१६२५॥

Mantra without Swara
किमित्ते विष्णो परिचक्षि नाम प्र यद्ववक्षे शिपिविष्टो अस्मि । मा वर्पो अस्मदप गूह एतद्यदन्यरूपः समिथे बभूथ ॥

किम् । इत् । ते । विष्णो । परिचक्षि । परि । चक्षि । नाम । प्र । यत् । ववक्षे । शिपिविष्टः । शिपि । विष्टः । अस्मि । मा । वर्पः । अस्मत् । अप । गूहः । एतत् । यत् । अन्यरूपः । अन्य । रूपः । समिथे । सम् । इथे । बभूथ ॥१६२५॥

Samveda - Mantra Number : 1625
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(विष्णो) हे यज्ञ ! (ते) तेरा (परिचक्षि) सर्वत्र विख्यात (नाम) नाम (किम्) क्या (इत्) ही कहा जावे वह तो वर्णन से बाहर है (यत्) जो कि तू (प्रववक्षे) कहता है कि मैं (शिपिविष्टः) किरणों में प्रविष्ट (अस्मि) हैं। (एतत्) इस किरणगत (वर्पः) रूप को (अस्मत्) हम याज्ञिकों से (मा) मत (अपगूह) छिपा (यत्) जो कि तू (समिथे) दुष्टशत्रुसमान नाना रोगों के साथ संग्राम में (अन्यरूपः) विलक्षण रूप वाला (बभूथ) होता है॥
यज्ञ जब सूर्यकिरणों में जाता है तो शत्रुतुल्य नाना रोगों से संग्राम करता है और ऐसा भिन्न विलक्षण रूप धारण करता है तो छिप नहीं सकता और मानो यज्ञ कहने लगता है कि मैं सूर्य किरणों में प्रविष्ट हूँ। ऐसे यज्ञ के स्वरूप औौर फल का क्या वर्णन किया जावे॥
Footnote
निघण्टु ३। १७॥ ३। ७॥ २। १७ निरुक्त ५। ८ अष्टाध्यायी ७। २। ६४ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥
ऋग्वेद ७। १००। ६ में भी॥