Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1622

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वृ꣡षा꣢ यू꣣थे꣢व꣣ व꣡ꣳस꣢गः कृ꣣ष्टी꣡रि꣢य꣣र्त्यो꣡ज꣢सा । ई꣡शा꣢नो꣣ अ꣡प्र꣢तिष्कुतः ॥१६२२॥

वृ꣡षा꣢꣯ । यू꣣था꣢ । इ꣣व । व꣡ꣳस꣢꣯गः । कृ꣣ष्टीः꣢ । इ꣣यर्ति । ओ꣡ज꣢꣯सा । ई꣡शा꣢꣯नः । अ꣡प्र꣢꣯तिष्कुतः । अ । प्र꣣तिष्कुतः ॥१६२२॥

Mantra without Swara
वृषा यूथेव वꣳसगः कृष्टीरियर्त्योजसा । ईशानो अप्रतिष्कुतः ॥

वृषा । यूथा । इव । वꣳसगः । कृष्टीः । इयर्ति । ओजसा । ईशानः । अप्रतिष्कुतः । अ । प्रतिष्कुतः ॥१६२२॥

Samveda - Mantra Number : 1622
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(ईशानः) शक्तिमान् (अप्रतिष्कृतः) जिस को रोकने को कोई बोल नहीं सकता (वृषा) वृष्टि करने वाला इन्द्र (कृष्टीः) मनुष्यों और तदुपलक्षित अन्य प्राणियों को (ओजसा) बल वा विद्युतरूप से (इयर्त्ति) प्राप्त होता है (इव) जैसे (वंसगः) उत्तम गति वाला साण्ड (यूथा) गौवों के यूथों को प्राप्त होता है तद्वत्॥
जैसे गौवों को विजार अत्यन्त वीर्यप्रद है, वैसे इन्द्रदेव भी मनुष्यादि प्राणियों में बलवीर्यरूप से भीतर विराजमान रहता है॥
Footnote
ऋग्वेद १। ७। ८ में भी॥