Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 162

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- कुसीदी काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
य꣡ इ꣢न्द्र चम꣣से꣡ष्वा सोम꣢꣯श्च꣣मू꣡षु꣢ ते सु꣣तः꣢ । पि꣡बेद꣢꣯स्य꣣ त्व꣡मी꣢शिषे ॥१६२॥

यः꣢ । इ꣢न्द्र । चमसे꣡षु꣢ । आ । सो꣡मः꣢꣯ । च꣣मू꣡षु꣢ । ते꣣ । सुतः꣢ । पि꣡ब꣢꣯ । इत् । अ꣣स्य । त्व꣢म् । ई꣣शिषे ॥१६२॥

Mantra without Swara
य इन्द्र चमसेष्वा सोमश्चमूषु ते सुतः । पिबेदस्य त्वमीशिषे ॥

यः । इन्द्र । चमसेषु । आ । सोमः । चमूषु । ते । सुतः । पिब । इत् । अस्य । त्वम् । ईशिषे ॥१६२॥

Samveda - Mantra Number : 162
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
फिर सोम को वर्णित करते हैं। (इन्द्र) इन्द्र ! वा राजन् ! (यः सोमः) जो सोम (चमूषु) पात्रों में (ते) तेरे लिये (सुतः) सिद्ध किया है (अस्य) इस सोम का (त्वम्) तू (आ, ईशिषे) सब प्रकार, अधिष्ठाता है (इत्) इस कारण (चमसेषु) चमस् नाम के फलकों में (पिब) पी॥
यज्ञकर्त्ताओं को योग्य है कि चमू नामक पात्रों में प्रथम सोम का अभिषव करें फिर चमस् नामक पात्रों द्वारा इन्द्रादि देवों वा राजादि के लिये दें और वे उसे शीघ्र पान करते हैं वा करें, क्योंकि वे ही ओषधि वर्ग के अधिष्ठाता हैं, उनके आनुकूल्य से उनकी उत्पत्ति आदि का व्यवहार अच्छा बनता है। इससे यह भी सूचित होता है कि सोम राजकीय औषधि है उसका स्वाम्य राजा के हाथ में होना चाहिए॥
Footnote
ऋ० ८। ८२। ७ में भी॥