Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1615

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अत्रिर्भौमः Chhand- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
वि꣣पश्चि꣢ते꣣ प꣡व꣢मानाय गायत म꣣ही꣡ न धारात्यन्धो꣢꣯ अर्षति । अ꣢हि꣣र्न꣢ जू꣣र्णा꣡मति꣢꣯ सर्पति꣣ त्व꣢च꣣म꣢त्यो꣣ न꣡ क्रीड꣢꣯न्नसर꣣द्वृ꣢षा꣣ ह꣡रिः꣢ ॥१६१५॥

वि꣣पश्चि꣡ते꣢ । वि꣣पः । चि꣡ते꣢꣯ । प꣡व꣢꣯मानाय । गा꣣यत । मही꣢ । न । धा꣡रा꣢꣯ । अ꣡ति꣢꣯ । अ꣡न्धः꣢꣯ । अ꣣र्षति । अ꣡हिः꣢꣯ । न । जू꣣र्णा꣢म् । अ꣡ति꣢꣯ । स꣣र्पति । त्व꣡च꣢꣯म् । अ꣡त्यः꣢꣯ । न । क्री꣡ड꣢꣯न् । अ꣣सरत् । वृ꣡षा꣢꣯ । ह꣡रिः꣢꣯ ॥१६१५॥

Mantra without Swara
विपश्चिते पवमानाय गायत मही न धारात्यन्धो अर्षति । अहिर्न जूर्णामति सर्पति त्वचमत्यो न क्रीडन्नसरद्वृषा हरिः ॥

विपश्चिते । विपः । चिते । पवमानाय । गायत । मही । न । धारा । अति । अन्धः । अर्षति । अहिः । न । जूर्णाम् । अति । सर्पति । त्वचम् । अत्यः । न । क्रीडन् । असरत् । वृषा । हरिः ॥१६१५॥

Samveda - Mantra Number : 1615
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! (विपश्चिते) मेधा तत्त्व वाले (पवमानाय) शुद्धिकारक सोम के लिये (गायत) गान करो = उस के गुणों का कीर्तन करो। वह सोम (मही) बड़ी (धारा) वृष्टिधारा के (इव) समान (अन्धः) अन्न को (अति) बहुत (अर्षति) वर्षाता है। (अहिः) सर्प (न) जैसे (जूर्णाम्) पुरानी (त्वचम्) कांचली को (अतिसर्पति) त्याग जाता है (वृषा) वृष्टिकारक (हरिः) हरा सोम (अत्यः) अश्व (न) सा शीघ्रगामी (असरत) दौड़ता = वेगवान् होता और वेग उत्पन्न करता है।
भारी वृष्टि जैसे अन्न उत्पन्न करती है, तद्वत् सोम भी वर्षा द्वारा अन्न को उत्पन्न करता है, शुद्धिकारक है, सर्वत्र जीर्णता को नष्ट कर यौवन उत्पन्न करता है, फुरती को फैलाता है, इस प्रकार के गुणों से सोम की प्रशंसा वा कीर्त्तन करना चाहिए॥
Footnote
ऋ० ९। ८६। ४४ में भी॥