Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 161

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रिशोकः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣भि꣡ त्वा꣢ वृषभा सु꣣ते꣢ सु꣣त꣡ꣳ सृ꣢जामि पी꣣त꣡ये꣢ । तृ꣣म्पा꣡ व्य꣢श्नुही꣣ म꣡द꣢म् ॥१६१॥

अ꣣भि꣢ । त्वा꣣ । वृषभ । सुते꣢ । सु꣣त꣢म् । सृ꣣जामि । पीत꣡ये꣢ । तृ꣣म्प꣢ । वि । अ꣣श्नुहि । म꣡द꣢꣯म् ॥१६१॥

Mantra without Swara
अभि त्वा वृषभा सुते सुतꣳ सृजामि पीतये । तृम्पा व्यश्नुही मदम् ॥

अभि । त्वा । वृषभ । सुते । सुतम् । सृजामि । पीतये । तृम्प । वि । अश्नुहि । मदम् ॥१६१॥

Samveda - Mantra Number : 161
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(वृषभ) वृष्टिकर्त्तः इन्द्र ! (सुते) तैयार होने पर (सुतम्) ! सोम को (पीतये) पीने के लिये (त्वा) तुझको (अभिसृजामि) हवन करता हूँ। (तृम्प) तृप्त हो (मदं, व्यश्नुहि) हर्ष कों, प्राप्त हो॥
भाव यह है कि इन्द्र वर्षा करता है इसलिये उसकी तृप्ति अर्थात् वृद्धि पुष्टि के लिये सम्पन्न तैयार होने पर सोम का हवन करना चाहिये। इन्द्र का मेघ वर्षाने के लिये उपयुक्त होना ही हर्ष है॥
Footnote
अष्टाध्यायी ६। ३। १३५॥ ६। ३। १३७ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ज्वालाप्रसाद जी भार्गव ने (अ। इ) इत्यादि पदपाठ के विरुद्ध निर्मूल व्याख्या की है। ऋ०। ८। ४५। २२। ७॥