Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 160

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
सु꣣रूपकृत्नु꣢मू꣣त꣡ये꣢ सु꣣दु꣡घा꣢मिव गो꣣दु꣡हे꣢ । जु꣣हूम꣢सि꣣ द्य꣡वि꣢द्यवि ॥१६०॥

सु꣣रूपकृत्नुम् । सु꣣रूप । कृत्नु꣢म् । ऊ꣣त꣡ये꣢ । सु꣣दु꣡घा꣢म् । सु꣣ । दु꣡घा꣢꣯म् । इ꣣व गोदु꣡हे꣢ । गो꣣ । दु꣡हे꣢꣯ । जु꣣हूम꣡सि꣣ । द्य꣡वि꣢꣯द्यवि । द्य꣡वि꣢꣯ । द्य꣣वि ॥१६०॥

Mantra without Swara
सुरूपकृत्नुमूतये सुदुघामिव गोदुहे । जुहूमसि द्यविद्यवि ॥

सुरूपकृत्नुम् । सुरूप । कृत्नुम् । ऊतये । सुदुघाम् । सु । दुघाम् । इव गोदुहे । गो । दुहे । जुहूमसि । द्यविद्यवि । द्यवि । द्यवि ॥१६०॥

Samveda - Mantra Number : 160
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हम लोग (ऊतये) अनावृष्ट्यादि से रक्षा के निमित्त (सुरूपकृत्रुम्) शोभन रूप करने वाले [सोम का इन्द्र के लिये] (द्यविद्यवि) प्रतिदिन (जुहूमसि) हवन करें। दृष्टान्त — (गोदुहे सुदुघामिव) जैसे गाय दुहने वाले के लिये दुधार गाय को॥
भाव यह है कि जैसे गाय दुहने वाले के लिये प्रतिदिन दुधार गौ को उपस्थित करते हैं जिससे वह दुग्ध दुहकर हमें देवे इसी प्रकार अकाल अवर्षणादि से रक्षित रहने के लिये इन्द्र के निमित्त सोम उपस्थित करना चाहिये जिससे वह जल वर्षा कर सुवर्ष करे।
Footnote
ऋ० १। ४। १ में भी॥