Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 16

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣢ति꣣ त्यं꣡ चारु꣢꣯मध्व꣣रं꣡ गो꣢पी꣣था꣢य꣣ प्र꣡ हू꣢यसे । म꣣रु꣡द्भि꣢रग्न꣣ आ꣡ ग꣢हि ॥१६॥

प्र꣡ति꣢꣯ । त्यम् । चा꣡रु꣢꣯म् । अ꣣ध्वर꣢म् । गो꣣पीथा꣡य꣢ । प्र । हू꣣यसे । मरु꣡द्भिः꣢ । अ꣣ग्ने । आ꣢ । ग꣣हि ॥१६॥

Mantra without Swara
प्रति त्यं चारुमध्वरं गोपीथाय प्र हूयसे । मरुद्भिरग्न आ गहि ॥

प्रति । त्यम् । चारुम् । अध्वरम् । गोपीथाय । प्र । हूयसे । मरुद्भिः । अग्ने । आ । गहि ॥१६॥

Samveda - Mantra Number : 16
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) हे ज्ञानमय ! तुम (मरुद्भिः) उपासकों से (गोपीयाय) आनन्दलाभ के लिये (त्यम्) उस (चारुम्) रमणीय (अध्वरम्) ज्ञानयज्ञभूमि = हृदयदेश को (प्रति) लक्ष्य करके (प्रहूयसे) ध्यान किये जाते हो। वह तुम (आगहि) प्राप्त होभो॥
अर्थात् परमात्मा जो ज्ञानमय है उसका, ज्ञानयज्ञ के ऋत्विज् (मरुत्) उपासक लोग, (गोपीथाय) सोमगान के तुल्य परमानन्द की प्राप्ति के लिये ध्यान करते हैं और प्रार्थना करते हैं कि सुन्दर यज्ञस्थल जो हमारा हृदयदेश है उसमें परमात्मा हमें मिले॥
भौतिक पक्ष में— (अग्ने) तू (चारुम्) सुन्दर (अध्वरम्) यज्ञस्थल (प्रति) को (गोपीथाय) सोमादि रस पीने के लिये (प्रहूयसे) बुलाया जाता है, सो तू (मरुद्भिः) वायुओं के साथ (आगहि) आ॥
तात्पर्य यह है कि कर्म फल का साधक अग्नि चारु = सुन्दर सुनिर्मित यज्ञकुण्ड में बुलाया जाता अर्थात् स्थापित किया जाता है और वायुओं के साथ आता है अर्थात् स्थापित होकर प्रदीप्त होते ही अपने मित्र वायुओं को प्रेरित करता है। विज्ञान की रीति से यह नियम है कि अग्नि अपने आस-पास के वायु को हलका करके उसमें गति उत्पन्न करता है। इसी लिये जहाँ अग्नि अधिक प्रचण्ड होता है वहां वायु भी वेग से बहने लगता है।
Footnote
निरुक्त १०। ३६॥ अष्टाध्यायी ७।२।१०२॥ १।४। ८८॥ ५॥ १। ३। ८॥ उणादि १।३॥१९॥ निघण्टु ३।१८ के प्रमाण संस्कृत भाष्य पृष्ठ ४३ से देखिये। ऐसी ही ऋचा ऋग्वेद १। १६। १ में है॥