Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1597

1875 Mantra
Devata- द्यावापृथिव्यौ Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
पु꣣नाने꣢ त꣣꣬न्वा꣢꣯ मि꣣थः꣢꣫ स्वेन꣣ द꣡क्षे꣢ण राजथः । ऊ꣣ह्या꣡थे꣢ स꣣ना꣢दृ꣣त꣢म् ॥१५९७॥

पुनाने꣡इति꣢ । त꣣न्वा꣢ । मि꣣थः꣢ । स्वे꣡न꣢꣯ । द꣡क्षे꣢꣯ण । रा꣣जथः । ऊ꣢ह्याथे꣣इ꣡ति꣢ । स꣣ना꣢त् । ऋ꣣त꣢म् ॥१५९७॥

Mantra without Swara
पुनाने तन्वा मिथः स्वेन दक्षेण राजथः । ऊह्याथे सनादृतम् ॥

पुनानेइति । तन्वा । मिथः । स्वेन । दक्षेण । राजथः । ऊह्याथेइति । सनात् । ऋतम् ॥१५९७॥

Samveda - Mantra Number : 1597
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हे द्यौ: ! और हे पृथिवी ! तुम दोनों (मिथः) एक-दूसरे को (तन्वा) अपने देह पिण्ड से (पुनाने) पवित्र करती हुई (स्वेन) अपने (दक्षेण) बल से (राजथः) विराजमान हो तथा (सनात्) सदा (ऋतम्) यज्ञ को (उह्याथे) ले चलती हो॥
द्युलोक वृष्ट्यादि से भूमि को और भूमिलोक यज्ञयोग्य ओषधि वनस्पत्यादि की उत्पत्ति और उसके द्वारा हुए यज्ञों से द्युलोक को पवित्र करता है, इस प्रकार दोनों लोक एक-दूसरे के पावन हैं॥
Footnote
ऋ० ४। ५६। ६ में भी॥