Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1596

1875 Mantra
Devata- द्यावापृथिव्यौ Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र꣢ वां꣣ म꣢हि꣣ द्य꣡वी꣢ अ꣣भ्यु꣡प꣢स्तुतिं भरामहे । शु꣢ची꣣ उ꣢प꣣ प्र꣡श꣢स्तये ॥१५९६॥

प्र꣢ । वा꣣म् । म꣡हि꣢꣯ । द्यवी꣢꣯इ꣡ति꣢ । अ꣣भि꣢ । उ꣡प꣢꣯स्तुतिम् । उ꣡प꣢꣯ । स्तु꣣तिम् । भरामहे । शु꣢ची꣢꣯इति । उ꣡प꣢꣯ । प्र꣡श꣢꣯स्तये । प्र । श꣣स्तये ॥१५९६॥

Mantra without Swara
प्र वां महि द्यवी अभ्युपस्तुतिं भरामहे । शुची उप प्रशस्तये ॥

प्र । वाम् । महि । द्यवीइति । अभि । उपस्तुतिम् । उप । स्तुतिम् । भरामहे । शुचीइति । उप । प्रशस्तये । प्र । शस्तये ॥१५९६॥

Samveda - Mantra Number : 1596
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हे (द्यवी) प्रकाशमान (शुची) शुद्ध पवित्र दोनों द्युलोक और पृथिवी लोको ! (वाम्) तुम दोनों की (उपप्रशस्तये) उपप्रशंसा के लिये (महि) बाहुल्य से (उपस्तुतिम्) उपप्रशंसा को हम (अभि प्र भरामहे) सर्वतः उत्कर्ष से सम्पादन करते हैं॥
द्यावाभूमी पद से द्युलोक और पृथिवी लोक में स्थित चराचर प्रजा की स्तुति की जाती है॥
Footnote
ऋग्वेद ४। ५६। ५ में भी॥