Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1593

1875 Mantra
Devata- पूषा Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣣त꣡ नो꣢ गो꣣ष꣢णिं꣣ धि꣡य꣢मश्व꣣सां꣡ वा꣢ज꣣सा꣢मु꣣त꣢ । नृ꣣व꣡त्कृ꣢णुह्यू꣣त꣡ये꣢ ॥१५९३॥

उ꣣त꣢ । नः꣣ । गोष꣡णि꣢म् । गो꣣ । स꣡नि꣢꣯म् । धि꣡य꣢꣯म् । अ꣣श्वसा꣢म् । अ꣣श्व । सा꣢म् । वा꣣जसा꣢म् । वा꣣ज । सा꣢म् । उ꣣त꣢ । नृ꣣व꣢त् । कृ꣣णुहि । ऊत꣡ये꣢ ॥१५९३॥

Mantra without Swara
उत नो गोषणिं धियमश्वसां वाजसामुत । नृवत्कृणुह्यूतये ॥

उत । नः । गोषणिम् । गो । सनिम् । धियम् । अश्वसाम् । अश्व । साम् । वाजसाम् । वाज । साम् । उत । नृवत् । कृणुहि । ऊतये ॥१५९३॥

Samveda - Mantra Number : 1593
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हे सकलजगत्पोषक ! पूषन् ! परमेश्वर ! (नः) हमारी (ऊतये) रक्षा के लिये (गोषणिम्) गौ देने वाली (उत) और (अश्वसाम्) घोड़े देने वाली (उत) और (वाजसाम्) अन्न वा बल देने वाली (धियम्) बुद्धि को (कृणुहि) कीजिये॥
सम्पूर्ण जगत् के पालक पोषक परमेश्वर वा सूर्य किरण समूह के प्रसाद से मनुष्यों को वैसी बुद्धि प्राप्त होती है जिससे गौ, अश्व, अन्न, बल आदि सब सुखभोग की सामग्री सुलभ हो॥
Footnote
ऋग्वेद ६। ५३। १० का पाठभेद संस्कृतभाष्य में देखिये॥