Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1591

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अनानतः पारुच्छेपिः Chhand- अत्यष्टिः Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
प्रा꣢ची꣣म꣡नु꣢ प्र꣣दि꣡शं꣢ याति꣣ चे꣡कि꣢त꣣त्स꣢ꣳ र꣣श्मि꣡भि꣢र्यतते दर्श꣣तो꣢꣫ रथो꣣ दै꣡व्यो꣢ दर्श꣣तो꣡ रथः꣢꣯ । अ꣡ग्म꣢न्नु꣣क्था꣢नि꣣ पौ꣢꣫ꣳस्येन्द्रं꣣ जै꣡त्रा꣢य हर्षयन् । व꣡ज्र꣢श्च꣣ य꣡द्भव꣢꣯थो꣣ अ꣡न꣢पच्युता स꣣म꣡त्स्वन꣢꣯पच्युता ॥१५९१॥

प्रा꣡ची꣢꣯म् । अ꣡नु꣢꣯ । प्र꣣दि꣡श꣢म् । प्र꣣ । दि꣡श꣢꣯म् । या꣣ति । चे꣡कि꣢꣯तत् । सम् । र꣣श्मि꣡भिः꣢ । य꣣तते । दर्शतः꣢ । र꣡थः꣢꣯ । दै꣡व्यः꣢꣯ । द꣣र्शतः꣢ । र꣡थः꣢꣯ । अ꣡ग्म꣢꣯न् । उ꣣क्था꣡नि꣢ । पौ꣡ꣳस्या꣢꣯ । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । जै꣡त्रा꣢꣯य । ह꣣र्षयन् । व꣡ज्रः꣢꣯ । च꣣ । य꣢त् । भ꣡व꣢꣯थः । अ꣡न꣢꣯पच्युता । अन् । अ꣣पच्युता । सम꣡त्सु꣢ । स꣣ । म꣡त्सु । अ꣡न꣢꣯पच्युता । अन् । अ꣣पच्युता ॥१५९१॥

Mantra without Swara
प्राचीमनु प्रदिशं याति चेकितत्सꣳ रश्मिभिर्यतते दर्शतो रथो दैव्यो दर्शतो रथः । अग्मन्नुक्थानि पौꣳस्येन्द्रं जैत्राय हर्षयन् । वज्रश्च यद्भवथो अनपच्युता समत्स्वनपच्युता ॥

प्राचीम् । अनु । प्रदिशम् । प्र । दिशम् । याति । चेकितत् । सम् । रश्मिभिः । यतते । दर्शतः । रथः । दैव्यः । दर्शतः । रथः । अग्मन् । उक्थानि । पौꣳस्या । इन्द्रम् । जैत्राय । हर्षयन् । वज्रः । च । यत् । भवथः । अनपच्युता । अन् । अपच्युता । समत्सु । स । मत्सु । अनपच्युता । अन् । अपच्युता ॥१५९१॥

Samveda - Mantra Number : 1591
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
जैसे (चेकितत्) चेतता हुआ (दैव्यः) दिव्य (दर्शतः) दिखाने वाला और स्वयं दर्शनीय (रथः) सूर्य का रमणीय गोला (रश्मिभिः) किरणों के (सम्) साथ (प्राचीं दिशम्) पूर्व दिशा को (अनु) आनुपूर्व्यसे (प्रयाति) परिक्रमा करता हुआ जाता है, (यतते) और आकर्षणादि यत्न भी करता है, तद्वत् (दर्शतः) दर्शनीय (रथः) विजयी महारथी इन्द्र राजा का रथ रमरणीय यान होता है और (पौंस्या) लोगों के कहे (उक्थानि) स्तोत्र (इन्द्रम्) उस राजा को (जैत्राय) विजय के लिये (हर्षयन्) हर्ष दिलाते हुए (अग्मन्) प्राप्त होते हैं (यत्) जिससे (वज्रः) वज्र (च) और अन्य आयुध (समत्सु) संग्रामों में (अनऽपच्युता) खाली न जाने वाले = अकुण्ठित (भवथः) होते हैं। (अनपच्युता) यह दूसरी बार आदरार्थ वीप्सा का पाठ है॥
जिस प्रकार रमणीय सूर्य का गोला रथ के समान पूर्व दिशा से क्रमपूर्वक अपनी किरणरूप शस्त्रास्त्रों सहित मानो रोग शोक अन्धकारादि शत्रुओं के नाशार्थ और पृथिव्यादि लोकों के धारणाऽऽकर्षणादि के लिए जाता है, इसी प्रकार राजा को भी दिग्विजयार्थ दुष्ट शत्रुओं के निवारण और धर्मात्माओं के धारण पालनपोषण के लिये वज्रादि शस्त्रास्त्रों सहित गमन करना चाहिये जिससे हर्ष दिलाने वाले जी बढ़ाने वाले स्तुतिवचनों द्वारा प्रोत्साहित राजा के शस्त्रास्त्र संग्रामों में व्यर्थ न जायें = कुण्ठित न रहें॥
Footnote
ऋग्वेद ९। १११। ३ में भी॥