Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 159

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- इरिम्बिठिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣यं꣡ त꣢ इन्द्र꣣ सो꣢मो꣣ नि꣡पू꣢तो꣣ अ꣡धि꣢ ब꣣र्हि꣡षि꣢ । ए꣡ही꣢म꣣स्य꣢꣫ द्रवा꣣ पि꣡ब꣢ ॥१५९॥

अ꣣य꣢म् । ते꣣ । इन्द्र । सो꣡मः꣢꣯ । नि꣡पू꣢꣯तः । नि । पू꣣तः । अ꣡धि꣢꣯ । ब꣣र्हि꣡षि꣢ । आ । इ꣣हि । ईम् । अस्य꣢ । द्र꣡व꣢꣯ । पि꣡ब꣢꣯ ॥१५९॥

Mantra without Swara
अयं त इन्द्र सोमो निपूतो अधि बर्हिषि । एहीमस्य द्रवा पिब ॥

अयम् । ते । इन्द्र । सोमः । निपूतः । नि । पूतः । अधि । बर्हिषि । आ । इहि । ईम् । अस्य । द्रव । पिब ॥१५९॥

Samveda - Mantra Number : 159
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
पूर्वमन्त्र में इन्द्र के लिये सोम का वर्णन करो, यह कहा था। सो वर्णन करते हैं कि— (इन्द्र) वृष्टिकर्त्ता ! (अयम्) यह (निपूतः) नितरां संस्कार किया हुआ (सोमः) सोम (ते) तेरे लिये (बर्हिषि, अधि) यज्ञ में [हवन किया है] (अस्य) इस का (पिब) पान कर (एहि)(द्रव) दौड़॥
Footnote
जब कि मनुष्य वृष्टि के हेतु इन्द्रयाग के लिये सोम को तैयार करें तब प्रथम परमेश्वर की स्तुति [देखो पूर्वमन्त्र] करके फिर अग्नि में सोम का हवन करें जिससे इन्द्र नामक अग्नि दौड़ जावे और उसे शोषण कर वर्षा का हेतु हो। ऋ० ८। १७। ११ में भी॥