Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1589

1875 Mantra
Devata- विश्वकर्मा Rishi- विश्वकर्मा भौवनः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वि꣡श्व꣢कर्मन्ह꣣वि꣡षा꣢ वावृधा꣣नः꣢ स्व꣣यं꣡ य꣢जस्व त꣣न्व꣢३ꣳ स्वा꣡ हि ते꣢꣯ । मु꣡ह्य꣢न्त्व꣣न्ये꣢ अ꣣भि꣢तो꣣ ज꣡ना꣢स इ꣣हा꣡स्माकं꣢꣯ म꣣घ꣡वा꣢ सू꣣रि꣡र꣢स्तु ॥१५८९॥

वि꣡श्व꣢꣯कर्मन् । वि꣡श्व꣢꣯ । क꣣र्मन् । हवि꣡षा꣢ । वा꣣वृधानः꣢ । स्व꣣य꣢म् । य꣣जस्व । तन्व꣢म् । स्वा । हि । ते꣣ । मु꣡ह्य꣢꣯न्तु । अ꣣न्ये꣢ । अ꣣न् । ये꣢ । अ꣣भि꣡तः꣢ । ज꣡ना꣢꣯सः । इ꣣ह꣢ । अ꣣स्मा꣡क꣢म् । म꣣घ꣡वा꣢ । सू꣡रिः꣢꣯ । अ꣣स्तु ॥१५८९॥

Mantra without Swara
विश्वकर्मन्हविषा वावृधानः स्वयं यजस्व तन्व३ꣳ स्वा हि ते । मुह्यन्त्वन्ये अभितो जनास इहास्माकं मघवा सूरिरस्तु ॥

विश्वकर्मन् । विश्व । कर्मन् । हविषा । वावृधानः । स्वयम् । यजस्व । तन्वम् । स्वा । हि । ते । मुह्यन्तु । अन्ये । अन् । ये । अभितः । जनासः । इह । अस्माकम् । मघवा । सूरिः । अस्तु ॥१५८९॥

Samveda - Mantra Number : 1589
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(विश्वकर्मन्) हे विश्वस्रष्टः ! परमेश्वर ! (वावृधानः) जगत् की वृद्धि करते हुए आप (स्वाहिते) अपने आप आधान किये हुए (तन्वाम्) विस्तृत अग्निकुण्ड में (हविषा) हव्य से (स्वयम्) अपने आप (यजस्व) यजन करते हैं, (अन्ये) साधारण अन्य अज्ञानी (जनासः) मनुष्य (इह) इस विषय (अभितः) सर्वतः (मुह्यन्तु) भूलते हैं तो भूलो परन्तु (अस्माकम्) हम में (मघवा) यज्ञवाला पुरुष (सूरिः) पण्डित जानने वाला और आपके यज्ञ को देख कर स्वयं यज्ञ करने वाला (अस्तु) होवे॥
जगत् को धन धान्य आरोग्यादि से बढ़ाते हुए परमात्मा ने स्वयं सूर्यादि लोकरूप बड़े विस्तृत यज्ञकुण्डों में अग्न्याधान करके उनमें ओषधि वनस्पति यादि का होम कर रक्खा है जिसको प्रायः अज्ञानी लोग नहीं जानते सो मत जानो, परन्तु इसमें से याज्ञिक लोग इस रहस्य को जानने वाला और आपके यज्ञ को देखकर स्वयं यज्ञानुष्ठान करने वाला होवे॥
Footnote
निरुक्त १०। २५॥ १०। २६॥ १०। २७, सायणाचार्य इत्यादि प्रमाण और ऋ० १०। ८१। ६ का पाठभेद संस्कृतभाष्य में देखिये॥