Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1584

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- सौभरि: काण्व: Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ꣢श्व꣣ न꣢ गी꣣र्भी꣢ र꣣꣬थ्य꣢꣯ꣳ सु꣣दा꣡न꣢वो मर्मृ꣣ज्य꣡न्ते꣢ देव꣣य꣡वः꣢ । उ꣣भे꣢ तो꣣के꣡ तन꣢꣯ये दस्म विश्पते꣣ प꣢र्षि꣣ रा꣡धो꣢ म꣣घो꣡ना꣢म् ॥१५८४॥

अ꣡श्व꣢꣯म् । न । गी꣣र्भिः꣢ । र꣣थ्यम्꣢ । सु꣣दा꣡न꣢वः । सु꣣ । दा꣡न꣢꣯वः । म꣣र्मृज्य꣡न्ते꣢ । दे꣣वय꣡वः꣢ । उ꣣भे꣡इति꣢ । तो꣣के꣡इति꣢ । त꣡न꣢꣯ये । द꣣स्म । विश्पते । प꣡र्षि꣢꣯ । रा꣡धः꣢꣯ । म꣣घो꣡ना꣢म् ॥१५८४॥

Mantra without Swara
अश्व न गीर्भी रथ्यꣳ सुदानवो मर्मृज्यन्ते देवयवः । उभे तोके तनये दस्म विश्पते पर्षि राधो मघोनाम् ॥

अश्वम् । न । गीर्भिः । रथ्यम् । सुदानवः । सु । दानवः । मर्मृज्यन्ते । देवयवः । उभेइति । तोकेइति । तनये । दस्म । विश्पते । पर्षि । राधः । मघोनाम् ॥१५८४॥

Samveda - Mantra Number : 1584
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(दस्म) साक्षात् करने योग्य ! (विश्पते) प्रजापते ! परमात्मन् ! (सुदानवः) जिन्होंने अच्छे दान किये हैं वे भाग्यवान् (देवयवः) देवों को चाहने वाले जन (रथ्यम्) रथ के ले चलने वाले (अश्वम्) घोड़े (न) के समान कर्मफल के पहुंचाने वाले तुझ को (गीर्भिः) स्तोत्रों से (मर्मृज्यन्ते) स्तुत करते हैं क्योंकि तू (मघोनाम्) ज्ञानयज्ञाऽनुष्ठानियों के (तोके) पुत्र (तनये) और पौत्र (उभे) दोनों में (राधः) धन धान्यादि को (पर्षि) देता है॥
परमात्मा की भले प्रकार उपासना प्रार्थना करने वाले भाग्यशाली जनों के पुत्र पौत्रादि सन्तति पर्यन्त को धन धान्यादि की कमी नहीं रहती, इस लिये वह कर्म फलदाता सदा स्तुति के योग्य है।
भौतिक पक्ष में—(दस्म) देखने योग्य ! (विश्पते) यज्ञ द्वारा अन्नादि उत्पन्न करके प्रजा का पालन करने वाले ! अग्ने ! (सुदानवः) अच्छा दान करने वाले (देवयवः) देवों को चाहने वाले यजमान लोग (रथ्यम्) रथ वाहने वाले (अश्वम्) घोड़े (न) के समान हव्य वाहने वाले तुझ को (गीर्भिः) वचनों से (मर्मृज्यन्ते) परिचरित करते हैं क्योंकि (मघोनाम्) यज्ञ वालों के (तोके) पुत्र औौर (तनये) पौत्र (उभे) दोनों में (राधः) धन धान्यादि को (पर्षि) तू देता है॥
भले प्रकार यश द्वारा अग्नि की परिचर्या करने वालों के पुत्र पौत्रादि सन्तति पर्यन्त धन धान्यादि की समृद्धि होती है, इसलिये रथ्य अश्व के तुल्य हव्यों के वोढा अग्नि की वचनों से प्रशंसा करनी चाहिये॥
Footnote
ऋग्वेद० ८। १०३। ७ में भी॥