Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1577

1875 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रा꣢ग्नी꣣ अ꣡प꣢स꣣स्प꣢꣯र्युप꣣ प्र꣡ य꣢न्ति धी꣣त꣡यः꣢ । ऋ꣣त꣡स्य꣢ प꣣थ्या꣢३ अ꣡नु꣢ ॥१५७७॥

इ꣡न्द्रा꣢꣯ग्नी । इ꣡न्द्र꣢꣯ । अ꣣ग्नीइ꣡ति꣢ । अ꣡प꣢꣯सः । प꣡रि꣢꣯ । उ꣡प꣢꣯ । प्र । य꣣न्ति । धीत꣡यः꣢ । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । प꣣थ्याः꣢ । अ꣡नु꣢꣯ ॥१५७७॥

Mantra without Swara
इन्द्राग्नी अपसस्पर्युप प्र यन्ति धीतयः । ऋतस्य पथ्या३ अनु ॥

इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । अपसः । परि । उप । प्र । यन्ति । धीतयः । ऋतस्य । पथ्याः । अनु ॥१५७७॥

Samveda - Mantra Number : 1577
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्राग्नी) हे इन्द्र ! और हे अग्ने ! (धीतयः) सोमादि को धारण करने वा पीने वाला होता अध्वर्यु उद्गाता और ब्रह्मा आदि ऋत्विज् लोग (ऋतस्य) कर्मफल के (पथ्याः) मार्गों को (अनु) लक्ष्य करके (अपसः) हमारे द्वारा किये जाते हुए यज्ञकर्म के (परि, उप, प्र, यन्ति) चारों ओर समीप, बहुतायत से, तुमको प्राप्त होते हैं॥
Footnote
ऋ० ३। १२। ७ में भी॥