Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1576

1875 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रा꣢ग्नी नव꣣तिं꣡ पुरो꣢꣯ दा꣣स꣡प꣢त्नीरधूनुतम् । सा꣣क꣡मेके꣢꣯न꣣ क꣡र्म꣢णा ॥१५७६॥

इ꣡न्द्रा꣢꣯ग्नी । इ꣡न्द्र꣢꣯ । अ꣣ग्नीइ꣡ति꣢ । न꣣वति꣢म् । पु꣡रः꣢꣯ । दा꣣स꣡प꣢त्नीः । दा꣣स꣢ । प꣣त्नीः । अधूनुतम् । साक꣢म् । ए꣡के꣢꣯न । क꣡र्म꣢꣯णा ॥१५७६॥

Mantra without Swara
इन्द्राग्नी नवतिं पुरो दासपत्नीरधूनुतम् । साकमेकेन कर्मणा ॥

इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । नवतिम् । पुरः । दासपत्नीः । दास । पत्नीः । अधूनुतम् । साकम् । एकेन । कर्मणा ॥१५७६॥

Samveda - Mantra Number : 1576
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्राग्नी) इन्द्र ! मध्यस्थान देव ! और अग्ने ! पृथिवीस्थान देव ! तुम दोनों (साकम्) साथ (एकेन) अपने एक अभिन्न मिले हुए (कर्मणा) दाहादि कर्म से (दासपत्नीः) उपक्षय करने वाले हमारे शत्रु जिनके पालक हैं, उन (नवतिम्) नव्वे ९० (पुरः) पुरियों को (अधूनुतम्) कम्पमान कर देते हो॥
जिस प्रकार इस देह में १० प्राण १० इन्द्रियाँ, ६ रस और ४ अन्तःकरण, ये ३० तीस पुरी ३ सत्त्व रज तम गुणों के भेद से भिन्न होकर ९० नब्बे हैं, इसी प्रकार एक ब्रह्माण्ड में भी ६ ऋतु—हिम, शिशिर, वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा और शरद्। १० प्राण, अपान, उदान, समान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनञ्जय, १० प्रसिद्ध इन्द्रियों और चार मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार रूप अन्तःकरण के कारण पदार्थ सर्वत्र फैले हैं, वे भी ३ गुणों के भेद से ९० प्रकार के हो जाते हैं। वे ९० पुरी जब हमारे अनुकूल हों तब मित्रपुरी और जब विरुद्ध वा प्रतिकूल हों तब शत्रुपुरी कहाती हैं, इन्द्र और अग्नि के यजन करने से ये दोनों उन ९० पुरियों के प्रतिकूल अंश वा प्रभाव को अपने दाह प्रकाश आदि मिश्रित कर्म से नष्ट कर डालते हैं॥
Footnote
ऋ० ३। १२। ६ में भी॥