Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1575

1875 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र꣡ वा꣢मर्चन्त्यु꣣क्थि꣡नो꣢ नीथा꣣वि꣡दो꣢ जरि꣣ता꣡रः꣢ । इ꣡न्द्रा꣢ग्नी꣣ इ꣢ष꣣ आ꣡ वृ꣢णे ॥१५७५॥

प्र꣢ । वा꣣म् । अर्चन्ति । उक्थि꣡नः꣢ । नी꣣थावि꣢दः꣢ । नी꣣थ । वि꣡दः꣢꣯ । ज꣣रिता꣡रः꣢ । इ꣡न्द्रा꣢꣯ग्नी । इ꣡न्द्र꣢꣯ । अ꣣ग्नीइ꣡ति꣢ । इ꣡षः꣢꣯ । आ । वृ꣣णे ॥१५७५॥

Mantra without Swara
प्र वामर्चन्त्युक्थिनो नीथाविदो जरितारः । इन्द्राग्नी इष आ वृणे ॥

प्र । वाम् । अर्चन्ति । उक्थिनः । नीथाविदः । नीथ । विदः । जरितारः । इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । इषः । आ । वृणे ॥१५७५॥

Samveda - Mantra Number : 1575
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्राग्नी) हे इन्द्र ! और अग्ने ! (उक्थिनः) उक्थ = शास्त्र = स्तोत्र वाले होता आदि और (नीथाविदः) स्तोत्र जानने वाले सामगान में चतुर उद्गाता आदि (जरितारः) स्तोता जन (वाम्) तुम दोनों का (अर्चन्ति) यजन करते हैं और मैं यजमान भी (इषे) अन्नाद्य के लिये तुम्हारा (प्र आ वृणे) सर्वथा अतिशय यजन करता हूँ॥ इन्द्र और अग्नि का व्याख्यान बहुत बार कर चुके हैं, वही यहां जानो॥
Footnote
ऋ० ३। १२। ५ में भी॥