Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1572

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- प्रयोगो भार्गवः पावकोऽग्निर्बार्हस्पत्यो वा गृहपति0यविष्ठौ सहसः पुत्रावन्यतरो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣣दं꣢ दे꣣व꣡स्य꣢ मी꣣ढु꣡षोऽना꣢꣯धृष्टाभिरू꣣ति꣡भिः꣢ । भ꣣द्रा꣡ सूर्य꣢꣯ इवोप꣣दृ꣢क् ॥१५७२॥

प꣣द꣢म् । दे꣣व꣡स्य꣢ । मी꣣ढु꣡षः꣢ । अ꣡ना꣢꣯धृष्टाभिः । अन् । आ꣣धृष्टाभिः । ऊति꣡भिः꣢ । भ꣣द्रा꣢ । सू꣡र्यः꣢꣯ । इ꣣व । उपदृ꣢क् । उ꣣प । दृ꣢क् ॥१५७२॥

Mantra without Swara
पदं देवस्य मीढुषोऽनाधृष्टाभिरूतिभिः । भद्रा सूर्य इवोपदृक् ॥

पदम् । देवस्य । मीढुषः । अनाधृष्टाभिः । अन् । आधृष्टाभिः । ऊतिभिः । भद्रा । सूर्यः । इव । उपदृक् । उप । दृक् ॥१५७२॥

Samveda - Mantra Number : 1572
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 15; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अनाधृष्टाभिः) न सताई हुई (ऊतिभिः) रक्षाओं से (मीदुषः) वर्षक (देवस्य) देव अग्नि का (पदम्) स्वरूप (सूर्य इव) सूर्य के समान आंखों का सहायक (भद्रा) शोभन उत्तम (उपदृक्) उपनेत्र होता है।
जव अग्नि के गुण भले प्रकार ज्ञात हो जावें तो रक्षापूर्वक उससे ऐसे उपनेत्र (दूरबीन और सूक्ष्मवीन आदि) बन सकते हैं कि जो सूर्य के समान आंख की सहायता करें कि जैसे सूर्य की सहायता से मनुष्य दूर और सूक्ष्म पदार्थों को देखता है॥
Footnote
ऋ० ८। १०२। १५ में भी॥