Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1542

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विरूप आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣡प꣢ त्वा जु꣣ह्वो꣢३꣱म꣡म꣢ घृ꣣ता꣡ची꣢र्यन्तु हर्यत । अ꣡ग्ने꣢ ह꣣व्या꣡ जु꣢षस्व नः ॥१५४२॥

उ꣡प꣢꣯ । त्वा꣢ । जु꣢ह्वः । म꣡म꣢꣯ । घृ꣣ता꣡चीः꣢ । य꣣न्तु । हर्यत । अ꣡ग्ने꣢꣯ । ह꣣व्या꣢ । जु꣣षस्व । नः ॥१५४२॥

Mantra without Swara
उप त्वा जुह्वो३मम घृताचीर्यन्तु हर्यत । अग्ने हव्या जुषस्व नः ॥

उप । त्वा । जुह्वः । मम । घृताचीः । यन्तु । हर्यत । अग्ने । हव्या । जुषस्व । नः ॥१५४२॥

Samveda - Mantra Number : 1542
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 15; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(हर्यत) हे अभिगम्य ! (अग्ने) परमेश्वर ! वा पावक ! (मम) मुझ स्तोता की (घृताचीः) स्नेहभक्तिपूर्ण (जुह्व) अन्तःकरण की वृत्तियें वा घृत भरे चमस जुह्वा स्त्रुच् को जिनसे होम किया जाता है (त्वा) तुझ को (उपयन्तु) प्राप्त हों, सो तू (नः) हम उपासकों वा अग्निहोत्रियों के (हव्या) होमयोग्य अन्तःकरणों वा घृतादि हव्यों को (जुषस्व) स्वीकृत कर॥
Footnote
ऋ० ८। ४४। ५ में भी॥