Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1533

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विरूप आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ई꣡शि꣢षे꣣ वा꣡र्य꣢स्य꣣ हि꣢ दा꣣त्र꣡स्या꣢ग्ने꣣꣬ स्वः꣢꣯पतिः । स्तो꣣ता꣢ स्यां꣣ त꣢व꣣ श꣡र्म꣢णि ॥१५३३॥

ई꣡शि꣢꣯षे । वा꣡र्य꣢꣯स्य । हि । दा꣣त्र꣡स्य꣢ । अ꣣ग्ने । स्वः꣢पति । स्वऽ३रि꣡ति꣢ । प꣣तिः । स्तोता꣢ । स्या꣣म् । त꣡व꣢꣯ । श꣡र्म꣢꣯णि ॥१५३३॥

Mantra without Swara
ईशिषे वार्यस्य हि दात्रस्याग्ने स्वःपतिः । स्तोता स्यां तव शर्मणि ॥

ईशिषे । वार्यस्य । हि । दात्रस्य । अग्ने । स्वःपति । स्वऽ३रिति । पतिः । स्तोता । स्याम् । तव । शर्मणि ॥१५३३॥

Samveda - Mantra Number : 1533
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) अग्ने ! तू (स्वः) सुख का (पतिः) स्वामी है और (वार्यस्य) वरणीय (दात्रस्य) दान करने योग्य धन धान्य का (ईशिषे) स्वामी है, अतः मैं (शर्मणि) सुख चाहूँ तो (तव) तेरा (स्तोता) गुण वर्णनकर्ता (स्याम्) होऊं॥
अग्निविद्या से मनुष्य उत्तम धन धान्यादि से जो दानादि में काम में लाये जावें उनके स्वामी हो सकते हैं अतः मनुष्यों को अग्निविषयक विज्ञान प्राप्त करने वाला होना चाहिए और वह तब हो सकता है जब कि वे अग्नि के स्तोता = गुण खोजने में श्रम करने वाले हों॥
Footnote
ऋ० ८। ४४। १८ में भी॥