Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1528

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- केतुराग्नेयः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣢या꣣ गा꣢ आ꣣क꣡रा꣢महै꣣ से꣡न꣢याग्ने꣣ त꣢वो꣣त्या꣢ । तां꣡ नो꣢ हिन्व म꣣घ꣡त्त꣢ये ॥१५२८॥

य꣡या꣢꣯ । गाः । आ꣣क꣡रा꣢महै । आ꣣ । क꣡रा꣢꣯महै । से꣡न꣢꣯या । अ꣣ग्ने । त꣡व꣢꣯ । ऊ꣣त्या꣢ । ताम् । नः꣣ । हिन्व । मघ꣡त्त꣢ये ॥१५२८॥

Mantra without Swara
यया गा आकरामहै सेनयाग्ने तवोत्या । तां नो हिन्व मघत्तये ॥

यया । गाः । आकरामहै । आ । करामहै । सेनया । अग्ने । तव । ऊत्या । ताम् । नः । हिन्व । मघत्तये ॥१५२८॥

Samveda - Mantra Number : 1528
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) अग्ने ! (सेनया) सूर्य सहित (यया) जिस (तव) तेरी की हुई (ऊत्या) रक्षा वा गति से (गाः) सूर्य किरणों को (आकरामहै) हम खींच सकें (ताम्) उस गति वा रक्षा को (नः) हमारे लिये (मधत्तये) धनदानार्थ = धनलाभार्थ (हिन्व) प्रेरित कर॥ जो लोग अग्नि से गति उत्पन्न करना जानते हैं वे सूर्य की किरणों में से अग्नि खींचकर सिद्ध करके अनेक धनलाभदायक कार्य कर सकते हैं॥
Footnote
ऋग्वेद १०। १५६। २ में भी॥