Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 152

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वत्सः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣ह꣢꣫मिद्धि पि꣣तु꣡ष्परि꣢ मे꣣धा꣢मृ꣣त꣡स्य꣢ ज꣣ग्र꣡ह꣢ । अ꣣ह꣡ꣳ सूर्य꣢꣯ इवाजनि ॥१५२॥

अ꣣ह꣢म् । इत् । हि । पि꣣तुः꣢ । प꣡रि꣢꣯ । मे꣣धा꣢म् । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । ज꣣ग्र꣡ह꣢ । अ꣣ह꣢म् । सू꣡र्यः꣢꣯ । इ꣣व । अजनि ॥१५२॥

Mantra without Swara
अहमिद्धि पितुष्परि मेधामृतस्य जग्रह । अहꣳ सूर्य इवाजनि ॥

अहम् । इत् । हि । पितुः । परि । मेधाम् । ऋतस्य । जग्रह । अहम् । सूर्यः । इव । अजनि ॥१५२॥

Samveda - Mantra Number : 152
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अहम्) मैंने (इत् हि) हो (पितुः) पालन करने वाले [इन्द्र परमेश्वर] से (ऋतस्य) सत्य वेद की (मेधाम्) धारणावती बुद्धि (परिजग्रह) ग्रहण की है। (अहम्) मैं (सूर्य इव) सूर्य-सा प्रकाशमान (अजनि) प्रसिद्ध हुआ हूँ॥
अर्थात् जो मनुष्य पिता परमात्मा से सत्य वेदविद्या का ग्रहण करते हैं वे ही सूर्यवत् संसार भर को ज्ञान से प्रकाशित करते हैं।
Footnote
ऋ० ८।६।१० में ‘जग्रह’ के स्थान में ‘जग्रम’ पाठ है॥