Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1511

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वमना वैयश्वः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
न꣢ ह्या꣣꣬ꣳ३꣱ग꣢ पु꣣रा꣢ च꣣ न꣢ ज꣣ज्ञे꣢ वी꣣र꣡त꣢र꣣स्त्व꣢त् । न꣡ की꣢ रा꣣या꣢꣫ नैवथा꣣ न꣢ भ꣣न्द꣡ना꣢ ॥१५११॥

न । हि । अ꣣ङ्ग꣢ । पु꣣रा꣢ । च꣣ । न꣢ । ज꣣ज्ञे꣢ । वी꣣र꣡त꣢रः । त्वत् । न । किः꣣ । राया꣢ । न । ए꣣व꣡था꣢ । न । भ꣣न्द꣡ना꣢ ॥१५११॥

Mantra without Swara
न ह्याꣳ३ग पुरा च न जज्ञे वीरतरस्त्वत् । न की राया नैवथा न भन्दना ॥

न । हि । अङ्ग । पुरा । च । न । जज्ञे । वीरतरः । त्वत् । न । किः । राया । न । एवथा । न । भन्दना ॥१५११॥

Samveda - Mantra Number : 1511
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अंग) हे प्रिय ! इन्द्र परमेश्वर ! (पुराचन) पूर्वकाल में भी और वर्तमान में भी (त्वत्) आप से अधिक (वीरतरः) अत्यन्त वीर पुरुष कोई (नहि) नहीं (जज्ञे) उत्पन्न हुआ, (न) न तो (राया) धन से, (न)(एवथा) रक्षा से (न) और न (भन्दना) स्तुत्यपने से, अर्थात् आप ही सर्वोपरि धनी, रक्षक और स्तुत्य हैं।
Footnote
ऋ० ८। २४। १५ में भी॥