Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1503

1875 Mantra
Devata- विश्वे देवाः Rishi- अग्निस्तापसः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ꣢ग्ने꣣ वि꣡श्वे꣢भिर꣣ग्नि꣢भि꣣र्जो꣢षि꣣ ब्र꣡ह्म꣢ सहस्कृत । ये꣡ दे꣢व꣣त्रा꣢꣫ य आ꣣यु꣢षु꣣ ते꣡भि꣢र्नो महया꣣ गि꣡रः꣢ ॥१५०३

अ꣡ग्ने꣢꣯ । वि꣡श्वे꣢꣯भिः । अ꣣ग्नि꣡भिः꣢ । जो꣡षि꣢꣯ । ब्र꣡ह्म꣢꣯ । स꣣हस्कृत । सहः । कृत । ये । दे꣣वत्रा꣢ । ये । आ꣣यु꣡षु꣢ । ते꣡भिः꣢꣯ । नः꣣ । महय । गि꣡रः꣢꣯ ॥१५०३॥

Mantra without Swara
अग्ने विश्वेभिरग्निभिर्जोषि ब्रह्म सहस्कृत । ये देवत्रा य आयुषु तेभिर्नो महया गिरः ॥१५०३

अग्ने । विश्वेभिः । अग्निभिः । जोषि । ब्रह्म । सहस्कृत । सहः । कृत । ये । देवत्रा । ये । आयुषु । तेभिः । नः । महय । गिरः ॥१५०३॥

Samveda - Mantra Number : 1503
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सहस्कृत) बल से अरणियों को रगड़ कर उत्पन्न किये ! (अग्ने) अग्ने ! तू (विश्वेभिः) सब (अग्निभिः) अग्नियों के साथ (ब्रह्म) हव्य अन्न को (जोषि) सेवन करता है (ये) जो अग्नि (देवत्रा) वायु आदि देवतों में हैं (ये) और जो (आयुषु) मनुष्यों में हैं (तेभिः) उन सबके साथ (नः) हमारी (गिरः) वाणियों को (महय) सत्कृत कर॥
यज्ञ में बलपूर्वक अरणियों से उत्पादित हुए अग्नि मनुष्यों के देहस्य और आकाश में वायु आदि में स्थित अग्नियों को अनुकूल बनाकर वाणी का सुधार करता है क्योंकि अन्यत्र भी कहा है कि “अग्नि वाणी होकर मुख में प्रवेश कर गया॥”
Footnote
ऋग्वेद ३। २४। ४ में केवल इस ऋचा का प्रथम पाद मिलता है, परन्तु अर्थ पूरे मन्त्र का लगभग इसी के समान है॥