Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1501

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वत्सः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣हं꣢ प्र꣣त्ने꣢न꣣ ज꣡न्म꣢ना꣣ गि꣡रः꣢ शुम्भामि कण्व꣣व꣢त् । ये꣢꣫नेन्द्रः꣣ शु꣢ष्म꣣मि꣢द्द꣣धे꣢ ॥१५०१॥

अ꣣ह꣢म् । प्र꣣त्ने꣡न꣢ । ज꣡न्म꣢꣯ना । गि꣡रः꣢꣯ । शु꣣म्भाभि । कण्वव꣢त् । ये꣡न꣢꣯ । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । शु꣡ष्म꣢꣯म् । इत् । द꣣धे꣢ ॥१५०१॥

Mantra without Swara
अहं प्रत्नेन जन्मना गिरः शुम्भामि कण्ववत् । येनेन्द्रः शुष्ममिद्दधे ॥

अहम् । प्रत्नेन । जन्मना । गिरः । शुम्भाभि । कण्ववत् । येन । इन्द्रः । शुष्मम् । इत् । दधे ॥१५०१॥

Samveda - Mantra Number : 1501
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
जीवात्मा कहता है कि — (अहम्) मैं निष्पाप (प्रत्नेन) पूर्वले (जन्मना) जन्म के संस्कारबल से (कण्ववत्) बुद्धिमानों के समान [बिना पढ़े भी] (गिरः) वेदवाणियों को (शुम्भामि) अलंकृत करता हूँ (येन) जिस से (इन्द्रः) परमेश्वर (इत्) अवश्य (शुष्मम्) बल को (बधे) मुझे धारित करे॥
Footnote
ऋ० ८। ६। ११ का पाठभेद संस्कृतभाष्य में देखिये॥