Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 15

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- शुनः शेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
ज꣡रा꣢बोध꣣ त꣡द्वि꣢विड्ढि वि꣣शे꣡वि꣢शे य꣣ज्ञि꣡या꣢य । स्तो꣡म꣢ꣳ रु꣣द्रा꣡य꣢ दृशी꣣क꣢म् ॥१५

ज꣡रा꣢꣯बोध । ज꣡रा꣢꣯ । बो꣣ध । त꣢त् । वि꣣विड्ढि । विशे꣡वि꣢शे । वि꣣शे꣢ । वि꣣शे । यज्ञि꣡या꣢य । स्तो꣡म꣢꣯म् । रु꣣द्रा꣡य꣢ । दृ꣣शीक꣢म् ॥१५॥

Mantra without Swara
जराबोध तद्विविड्ढि विशेविशे यज्ञियाय । स्तोमꣳ रुद्राय दृशीकम् ॥१५

जराबोध । जरा । बोध । तत् । विविड्ढि । विशेविशे । विशे । विशे । यज्ञियाय । स्तोमम् । रुद्राय । दृशीकम् ॥१५॥

Samveda - Mantra Number : 15
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(जराबोध) हे स्तुति से बोध्यमान ! (विशे विशे) सर्व प्रजा के हितार्थ (तत्) उस [पूर्व मन्त्रोक्त हमारे मन] को (विविड्ढि) प्राप्त हूजिये अर्थात् ध्यानपथ को प्राप्त हूजिये। “वयम्” यह पूर्व मन्त्र से अनुवृत्ति होती है। हम लोग (यज्ञियाय) योगयज्ञ के हितकर (रुद्राय) तुम न्यायकारी के लिये (दृशीकम्) मनोहर (स्तोमम्) स्तोत्र “करते हैं”॥
अर्थात् हे परमात्मन् ! हम आपको स्तुतिपूर्वक सम्बोधन करते हुए प्रार्थना करते हैं कि कृपया हमें हमारे हृदय में प्राप्त हूजिये। अर्थात् आप का प्राप्त होना कठिन है जब तक कि हमारी भक्ति से प्रसन्न वरद होकर आप स्वयं हमें प्राप्त न हों। किसी प्रकार तर्कादि के बल से आपका साक्षात्कार नहीं हो सकता। इसलिये दया करके हमें प्राप्त हूजिये। और हमारे इस ध्यानयज्ञ के आप हितैषी यज्ञस्वामी हैं, परन्तु आप पापियों को दण्ड देकर रुलाने वाले रुद्र हैं, इस कारण आप न्यायकारी के लिये हम लोग दर्शनीय उत्तम स्तुति करते हैं। जिससे आपके कृपाकटाक्ष से समस्त पापों से बचे रहें, आपके दण्डपात्र न बनें॥
भौतिक पक्ष में—(जराबोध) गुणकीर्त्तनपूर्वक प्रदीप्त किये हुए ! अग्ने ! (तत्) उस [अग्निकुण्ड] में (विविड्ढि) आहित हो (यज्ञियाय) यज्ञ के सिद्ध करने वाले (रुद्राय) तीव्र प्रज्वलित के लिये (दृशीकम्) मनोहर (स्तोमम्) वेद-पाठ से स्तुति “करते हैं” यह क्रियापद जोड़ना चाहिये॥
इस पक्ष में भाव यह है कि हम को प्रत्येक दिन की सायं प्रातः की वेला में पूर्व मन्त्र के अनुसार अग्नि के समीप आकर इस मन्त्र के अनुसार कुण्ड में अग्न्याधान करना चाहिये जिससे अग्नि उस कुण्ड में श्राहित हो। फिर स्तुतिपूर्वक अर्थात् अग्नि के गुणों का कीर्तन करने वाले “उद्बुध्यस्वाग्ने प्रतिजागृहि त्वमिष्टापूर्ते०” इत्यादि (यजुः १५।५४) मन्त्र में प्रदीप्त वा उद्बुद्ध करके समिधानों में अग्नि प्रविष्ट करना चाहिये। यह अग्नि, यज्ञ का साधने वाला और रुद्र अर्थात् अनाहिताग्नि लोगों को जो कि होम नहीं करते हैं पीड़क प्रतीत होता तथा दुष्ट शत्रुओं का आग्नेयास्त्रादि में प्रयुक्त होकर रुलाने वाला है। हमको योग्य है कि कुण्ड के समीप बैठकर पुष्कल मनोहर अग्नि देवता वाले मन्त्रों का पाठ करें॥
Footnote
निरु० १०।८॥ अष्टाध्यायी ३। ३। १०४॥ ३।३।१९॥ ६।१।१९८॥ ३।४।८७॥ ८।१।१॥ ८।१।४॥ ८।१।२॥ ८।१।३॥ ५।१।७१॥ ६।१।१९७ इत्यादि प्रमाण संस्कृतभाष्य पृष्ठ ४१ से देखिये। ऋग्वेद १।२७।१० में भी ऐसा ही पाठ है॥