Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1498

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वि꣣भक्ता꣡सि꣢ चित्रभानो꣣ सि꣡न्धो꣢रू꣣र्मा꣡ उ꣢पा꣣क꣢ आ । स꣣द्यो꣢ दा꣣शु꣡षे꣢ क्षरसि ॥१४९८॥

वि꣣भक्ता꣢ । वि꣣ । भक्ता꣢ । अ꣡सि । चित्रभानो । चित्र । भानो । सि꣡न्धोः꣢꣯ । ऊ꣣र्मौ꣢ । उ꣣पाके꣢ । आ । स꣣द्यः꣢ । स꣣ । द्यः꣢ । दा꣣शु꣡षे꣢ । क्ष꣣रसि ॥१४९८॥

Mantra without Swara
विभक्तासि चित्रभानो सिन्धोरूर्मा उपाक आ । सद्यो दाशुषे क्षरसि ॥

विभक्ता । वि । भक्ता । असि । चित्रभानो । चित्र । भानो । सिन्धोः । ऊर्मौ । उपाके । आ । सद्यः । स । द्यः । दाशुषे । क्षरसि ॥१४९८॥

Samveda - Mantra Number : 1498
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(चित्रभानो) हे विचित्र लपटों वाले ! अग्ने ! तू (विभक्ता) विभाग करने वाला भेदक है, (आ) जैसे (सिन्धोः) समुद्र वा नदी की (ऊर्मा) लहरी में (उपाके) समीप ही विभाग होता है तद्वत्। वह तू (दाशुषे) हव्य देने वाले यज्ञकर्त्ता के लिये (सद्यः) शीघ्र (क्षरसि) वर्षा करता है॥
अग्नि द्वारा भेद को प्राप्त हुआ हव्य शीघ्र वृष्टिकारक होता है, तात्पर्य है।
Footnote
ऋ० १। २७। ६ का पाठान्तर संस्कृतभाष्य में देखिये॥