Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1494

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- त्र्यरुणस्त्रैवृष्णः, त्रसदस्युः पौरुकुत्सः Chhand- ऊर्ध्वा बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
प्र꣣त्नं꣢ पी꣣यू꣡षं꣢ पू꣣र्व्यं꣢꣫ यदु꣣꣬क्थ्यं꣢꣯ म꣣हो꣢ गा꣣हा꣢द्दि꣣व꣡ आ निर꣢꣯धुक्षत । इ꣡न्द्र꣢म꣣भि꣡ जाय꣢꣯मान꣣ꣳ स꣡म꣢स्वरन् ॥१४९४॥

प्र꣣त्न꣢म् । पी꣣यू꣡ष꣢म् । पू꣣र्व्य꣢म् । यत् । उ꣣क्थ्य꣢म् । म꣣हः꣢ । गा꣣हा꣢त् । दि꣣वः꣢ । आ । निः । अ꣣धुक्षत । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । अ꣣भि꣢ । जा꣡य꣢꣯मानम् । सम् । अ꣣स्वरन् ॥१४९४॥

Mantra without Swara
प्रत्नं पीयूषं पूर्व्यं यदुक्थ्यं महो गाहाद्दिव आ निरधुक्षत । इन्द्रमभि जायमानꣳ समस्वरन् ॥

प्रत्नम् । पीयूषम् । पूर्व्यम् । यत् । उक्थ्यम् । महः । गाहात् । दिवः । आ । निः । अधुक्षत । इन्द्रम् । अभि । जायमानम् । सम् । अस्वरन् ॥१४९४॥

Samveda - Mantra Number : 1494
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(पूर्व्यम्) पूर्व उत्पन्न हुए अतएव (प्रत्नम्) पुरातन कारण रूप (पीयूषम्) पीने योग्य (यत्) जिस (उक्थ्यम्) प्रशंसनीय सोम को (महः) बड़े (गाहात्) अवगाहन (विवः) द्युलोक से (प्रा— निरघुक्षत) सामने निरा दुहा था (जायमानम्) लतारूप से उत्पन्न हुए उसी सोम को (इन्द्रम्) सूर्य को (अभि) लक्ष्य करके (समऽस्वरन्) प्रशंसित करते हैं।
वह अमृतसमान पीने योग्य प्राचीन सनातन कारणरूप सोम जो इस द्युलोक में भरा है और जिसको सामने करके निरन्तर प्राकृत रसायनी संयोग दुहते हैं उसी सोम को जब वह लता वल्ली पत्र रूप से उत्पन्न होता है तब अभिषुत करके सूर्यार्थ होम करने को लक्ष्य करके स्तुत करते हैं॥
Footnote
ऋ० ९। ११०। ८ का पाठान्तर संस्कृतभाष्य में देखिये॥