Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1487

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhand- अतिशक्वरी Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
सा꣣कं꣢ जा꣣तः꣡ क्रतु꣢꣯ना सा꣣क꣡मोज꣢꣯सा ववक्षिथ सा꣣कं꣢ वृ꣣द्धो꣢ वी꣣꣬र्यैः꣢꣯ सास꣣हि꣢꣫र्मृधो꣣ वि꣡च꣢र्षणिः । दा꣢ता꣣ रा꣡ध꣢ स्तुव꣣ते꣢꣫ काम्यं꣣ व꣢सु꣣ प्र꣡चे꣢तन꣣ सै꣡न꣢ꣳ सश्चद्दे꣣वो꣢ दे꣣व꣢ꣳ स꣣त्य꣡ इन्दुः꣢꣯ स꣣त्य꣡मिन्द्र꣢꣯म् ॥१४८७॥

सा꣣क꣢म् । जा꣣तः꣢ । क्र꣡तु꣢꣯ना । सा꣣क꣢म् । ओ꣡ज꣢꣯सा । व꣣वक्षिथ । साक꣢म् । वृ꣣द्धः꣢ । वी꣣र्यैः꣢ । सा꣣सहिः꣢ । मृ꣡धः꣢꣯ । वि꣡च꣢꣯र्षणिः । वि । च꣣र्षणिः । दा꣡ता꣢꣯ । रा꣡धः꣢꣯ । स्तु꣣वते꣢ । का꣡म्य꣢꣯म् । व꣡सु꣢꣯ । प्र꣡चे꣢꣯तन । प्र । चे꣣तन । सः꣢ । ए꣣नम् । सश्चत् । देवः꣡ । दे꣣व꣢म् । स꣣त्यः꣢ । इ꣡न्दुः꣢꣯ । स꣣त्य꣢म् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् ॥१४८७॥

Mantra without Swara
साकं जातः क्रतुना साकमोजसा ववक्षिथ साकं वृद्धो वीर्यैः सासहिर्मृधो विचर्षणिः । दाता राध स्तुवते काम्यं वसु प्रचेतन सैनꣳ सश्चद्देवो देवꣳ सत्य इन्दुः सत्यमिन्द्रम् ॥

साकम् । जातः । क्रतुना । साकम् । ओजसा । ववक्षिथ । साकम् । वृद्धः । वीर्यैः । सासहिः । मृधः । विचर्षणिः । वि । चर्षणिः । दाता । राधः । स्तुवते । काम्यम् । वसु । प्रचेतन । प्र । चेतन । सः । एनम् । सश्चत् । देवः । देवम् । सत्यः । इन्दुः । सत्यम् । इन्द्रम् ॥१४८७॥

Samveda - Mantra Number : 1487
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(प्रचेतन) चेताने वाले ! सूर्य ! (क्रतुना) कर्म और बुद्धितत्त्व के (साकम्) साथ और (ओजसा) आकर्षण बल के (साकम्) साथ (जातः) उदय हुआ (वीर्यैः) बलवान् किरणों के (साकम्) साथ (वृद्धः) वृद्धि को प्राप्त हुआ (ववक्षिथ) पृथिव्यादि लोकों को ढो रहा है। (मृधः) दुष्ट जन्तुओं को (सासहिः) तिरस्कृत करने वाला (विचर्षणिः) विशेषकर दृष्टि पर अनुग्रह करने वाला (स्तुवते) यजमान जो प्रशंसा करता है उसके लिये (राधः) कार्यों के साधन (काम्यम्) चाहने योग्य (वसु) धन धान्य का (दाता) देने वाला है। (एतम्) इस (सत्यम्) सच्चे (देवम्) देव (इन्द्रम्) सूर्य को (सत्यः) सच्चा (देवः) देव (इन्दुः) चन्द्रलोक वा सोम ओषधिराज (सश्चत्) प्राप्त होता है।
यह सूर्य सब जगत् का जगाने वाला होने से प्रचेतन है, धारण और आकर्षण के बल से पृथिव्यादि लोकों का वोढा (ले चलने वाला) और धारक है, प्रातः उदय होते ही किरणों से बढ़ता हुआ सब दुष्ट जन्तुनों का नाश करता है, सबकी आँखों का सहायक है, जो लोग इन सूर्य के गुणों को वेदसूक्तों द्वारा पढ़ते जानते और यज्ञ करते हैं उनकी धन और धान्य की वृद्धि करता है। इस ऐसे सूर्य लोक को प्रकाशाऽर्थ चन्द्रमा और होम किया हुआ सोम आश्रय करता है॥
Footnote
ऋ० २। २२। ३ का पाठभेद और अष्टाध्यायी २। ३। ६९ का प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥