Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1482

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- हर्यतः प्रागाथः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣢प꣣ स्र꣡क्वे꣢षु꣣ ब꣡प्स꣢तः कृण्व꣣ते꣢ ध꣣रु꣡णं꣢ दि꣣वि꣢ । इ꣡न्द्रे꣢ अ꣣ग्ना꣢꣫ नमः꣣꣬ स्वः꣢꣯ ॥१४८२॥

उ꣡प꣢꣯ । स्र꣡क्वे꣢꣯षु । ब꣡प्स꣢꣯तः । कृ꣣ण्व꣢ते । ध꣣रु꣡ण꣢म् । दि꣣वि꣢ । इ꣡न्द्रे꣢꣯ । अ꣣ग्ना꣢ । न꣡मः꣢꣯ । स्व३रि꣡ति꣢ ॥१४८२॥

Mantra without Swara
उप स्रक्वेषु बप्सतः कृण्वते धरुणं दिवि । इन्द्रे अग्ना नमः स्वः ॥

उप । स्रक्वेषु । बप्सतः । कृण्वते । धरुणम् । दिवि । इन्द्रे । अग्ना । नमः । स्व३रिति ॥१४८२॥

Samveda - Mantra Number : 1482
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(स्त्रक्वेषु) गलाफुओं के तुल्य लपटों में (बप्सतः) भक्षण करते = भस्म करते हुए (अग्नौ) अग्नि में, (इन्द्रे) मध्यस्थान वायु में और (दिवि) द्युस्थान आदित्य में (स्वः) सुखदायक (धरुणम्) धारण करने वाले स्तम्भरूप (नमः) अन्न को (उप कृण्वते) उपस्कृत करते हैं [ऋत्विज् लोग]।
अर्थात् जब होता लोग अग्नि में हव्य छोड़ते हैं तब वे तीनों लोकों को उस से उपकृत करते हैं॥
Footnote
ऋ० ८। ७२। १५ में भी॥