Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 148

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
य꣢꣫दिन्द्रो꣣ अ꣡न꣢य꣣द्रि꣡तो꣢ म꣣ही꣢र꣣पो꣡ वृष꣢꣯न्तमः । त꣡त्र꣢ पू꣣षा꣡भु꣢व꣣त्स꣡चा꣢ ॥१४८॥

य꣢त् । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । अ꣡न꣢꣯यत् । रि꣡तः꣢꣯ । म꣣हीः꣢ । अ꣣पः꣢ । वृ꣡ष꣢꣯न्तमः । त꣡त्र꣢꣯ । पू꣣षा꣢ । अ꣣भुवत् । स꣡चा꣢꣯ ॥१४८॥

Mantra without Swara
यदिन्द्रो अनयद्रितो महीरपो वृषन्तमः । तत्र पूषाभुवत्सचा ॥

यत् । इन्द्रः । अनयत् । रितः । महीः । अपः । वृषन्तमः । तत्र । पूषा । अभुवत् । सचा ॥१४८॥

Samveda - Mantra Number : 148
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(यत्) जबकि (इन्द्रः) बिजुलीरूप प्रग्नि (वृषन्तमः) अत्यन्त वर्षाने वाला (रितः) धारों से बहते हुए (महीः) भारी (अपः) जलों को (अनयत्) पृथिवी पर पहुँचाता है (तत्र) तब (पूषा) सूर्य की पोषक किरण (सचा) महकारी (भुवत्) होती हैं।
जबकि अत्यन्त वर्षा का कर्त्ता इन्द्र भारी मूसलाधार जल वर्षाता है तो सूर्य की पुष्टिकारक किरण वृक्ष वनस्पत्यादि का पोषण करने में सहकारी होती हैं, वही किरणें शुष्क होने पर नाश करती हैं और वर्षा में मिलकर पुष्टि करने से पूषा देवता कहाती हैं॥
Footnote
ऋ० ६।५७ ४ में भी॥