Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1479

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
धि꣣या꣡ च꣢क्रे꣣ व꣡रे꣢ण्यो भू꣣ता꣢नां꣣ ग꣢र्भ꣣मा꣡ द꣢धे । द꣡क्ष꣢स्य पि꣣त꣢रं꣣ त꣡ना꣢ ॥१४७९॥

धि꣣या꣢ । च꣣क्रे । व꣡रे꣢꣯ण्यः । भू꣣ता꣡ना꣢म् । ग꣡र्भ꣢꣯म् । आ । द꣣धे । द꣡क्ष꣢꣯स्य । पि꣣त꣡र꣢म् । त꣣ना꣢꣯ ॥१४७९॥

Mantra without Swara
धिया चक्रे वरेण्यो भूतानां गर्भमा दधे । दक्षस्य पितरं तना ॥

धिया । चक्रे । वरेण्यः । भूतानाम् । गर्भम् । आ । दधे । दक्षस्य । पितरम् । तना ॥१४७९॥

Samveda - Mantra Number : 1479
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
अग्नि द्वारा इन्द्रियों की प्रेरणा से क्या फल होता है सो कहते हैं:— (वरेण्यः) वरणीय अग्नि (भूतानाम्) प्राणियों के (गर्भम्) गर्भ का (आदधे) आधान करता है अर्थात् गर्भरूप से स्वयं स्थित होता है भौर (धिया) बुद्धि तत्त्व से (दक्षस्य) बल के (पितरम्) पिता = जनक (तना) धन को (चक्रे) उत्पन्न कराता है।
अग्नि इसलिये वरण करने योग्य है कि सब प्राणियों में जीवन रूप गर्भ बनकर स्वयं स्थित है और बुद्धितत्त्व की प्रेरणा करके बल के जनक धन को उत्पन्न कराता है॥
Footnote
ऋग्वेद ३। २७। ९ में भी॥