Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1476

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वे꣢त्था꣣ हि꣡ वे꣢धो꣣ अ꣡ध्व꣢नः प꣣थ꣡श्च꣢ दे꣣वा꣡ञ्ज꣢सा । अ꣡ग्ने꣢ य꣣ज्ञे꣡षु꣢ सुक्रतो ॥१४७६॥

वे꣡त्थ꣢꣯ । हि । वे꣣धः । अ꣡ध्व꣢꣯नः । प꣣थः꣢ । च꣣ । देव । अ꣡ञ्ज꣢꣯सा । अ꣡ग्ने꣢꣯ । य꣣ज्ञे꣡षु꣢ । सु꣣क्रतो । सु । क्रतो ॥१४७६॥

Mantra without Swara
वेत्था हि वेधो अध्वनः पथश्च देवाञ्जसा । अग्ने यज्ञेषु सुक्रतो ॥

वेत्थ । हि । वेधः । अध्वनः । पथः । च । देव । अञ्जसा । अग्ने । यज्ञेषु । सुक्रतो । सु । क्रतो ॥१४७६॥

Samveda - Mantra Number : 1476
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(वेधः) यज्ञ के विधाता ! (सुक्रतो) सुकर्मन् ! (देव) प्रकाशमान !(अग्ने) अग्ने ! तू (यज्ञेषु) दर्शपौर्णमासादि यज्ञों में (हि) निश्चय (अध्वनः) दूरमार्गों (च) और (पथः) समीपमार्गों को (अञ्जसा) अनायास शीघ्र (वेत्थ) जानता = पहुंचाता है॥
अग्नि को यज्ञ का विधायक होने से विधाता, और यज्ञरूप शोभनकर्म का प्रधान साधन होने से सुकर्मा और प्रकाशमान होने से देव कहा गया। वह देवदूत अग्नि दूरस्थ तथा समीपस्थ सब देवों के मार्गों को पहचानता अर्थात् उस-उस देवता को उसका भाग पहुंचाने में समर्थ है॥
Footnote
ऋ० ६। १६। ३ में भी॥